घर से दूर आये आज सालों हो गए
मैं अपनी कुर्सी पर पीठ टिकाये बचपन की यादों में खोया था
अचानक एक विचार मन में न जाने क्यों उभर आया
माँ को बचपन में रोटियां बनाते समय
मैं कई बार गुथे हुए आंटे से खेलने की जिद करता था
माँ हर बार मेरी जिद को पूरा करने के लिए
मुझे गुथे आटे से कोई आकार बना कर देती थी
मैं आज सोचता हूं
तो उन आकारों में विशेषतः जो मुझे याद आते हैं
वो या तो अधिकतर चिड़िया बना देती थी या साँप बनाकर देती थी
और मैं उन बनी हुई आकृतियों को पाकर काफी खुश और संतुष्ट महसूस करता था
पर अब बैठकर सोचता हूं तो समझ आता है
माँ जाने अनजाने में मुझे एक बात सीखा देने की फिराक में थी कि
बेटा जो ये भूख है ना एक दिन तुझे परिंदों की तरह मुझसे दूर उड़ा ले जाएगी
और ये भूख रुपी विषैला नाग एक दिन हमको आपको सभी को डस लेगा
और हम सब एक दिन मर जाएंगे लेकिन ये भूख नहीं मरेगी ;;
घर के बर्तन से खुशी निकाल लेते हैं '
गरीब घर के बच्चे खुद को संभाल लेते हैं ;
हाँ माना की वो चीजों के बहुत पास नहीं होते '
लेकिन गरीब घर के बच्चे कभी निराश नहीं होते ;
घर की चीजों में दिखा दी गई खिलौने की खुशी
हम गरीब घर के बच्चे बाहर की खुशी नहीं जानते।


