सब समझते हैं जिसे मैं वो कहानी हो रहा हूँ |
भाव में भीगा हुआ आँखों का पानी हो रहा हूँ |
दिल का एक शहर था जिसमें हम दोनों ही रहते थे |
साथ में अपने ख्वाब के बादल पीछे-पीछे चलते थे |
तुम जो आंचल लेकर आए दुख भरी इस नगरी में |
हम तो समझे बरसात हुई है प्यास भरी इस गगरी में |
दिल का निरव तरुवर फिर से कुसुमों की भाषा बोल रहा है |
साथ तुम्हारे बीते उस हर पल को अपना बोल रहा है |
सब समझती होगी तुम जो बात यहां मैं बोल रहा हूँ |
भाव में भीगा हुआ आँखों का पानी हो रहा हूँ |
उर्मिला की विरह वेदना दिनकर का मैं कर्ण बना हूँ |
तुम्हारी याद में शाख से टूटा एक अदना सा पर्ण बना हूँ |
इस समय की प्यास का मैं और मानी हो रहा हूँ |
भाव में भीगा हुआ आँखों का पानी हो रहा हूँ |
जख्म हमारे सिले नहीं और नमक का व्यापार बड़ा है
दर्द का चेहरा ओढ़े देखो सामने से संसार खड़ा है
इन नीरव रुदन भरी आँखों में आंसू का कोई शोर लिखे क्या
ऐसे डरे बुझे दीपक में ज्योति का कोई भोर लिखे क्या
सब समझते हैं जिसे मैं वो कहानी हो रहा हूँ |
भाव में भीगा हुआ आँखों का पानी हो रहा हूँ |