मंगलवार, 2 जून 2020

GAREEB KA CHHAPPAR

गरीब का छप्पर
GAREEB KA CHHAPPAR

न सूरज उगा न रात हुई ,
मेरी जिंदगी में ऐसी क्या बात हुई ,,

वो हर शाम तितलियाँ उड़ाता रहता है ,
उसकी फूलों से नजाने क्या बात हुई ,,







बणेर पर झूला खाती किसी गरीब की चादर जैसी फटी या कहें चिथड़ी छप्पर , जिसका दामन इतना साफ की कोई दाग था ही नहीं अर्थात उस छप्पर तले चारपाई बिछाने पर आसमान उतना साफ दिखाई देता जितना की पहली बारिश में |

         उसी छप्पर तले मनिया और गुड्डू की याद में लेटे दादा जी आज भी बोल बोलकर सोच रहें हैं | हाय ये बीमारी हमारे कितने बच्चों को खा गई !
    बया के घोषले जैसी चारपाई व् सिरहाने बांध में फसी जर्दे की पोटली , वही पुराना गमछा और बदन पर सफ़ेद धोती का चीर लपेटे दादा जी , शायद दादा जी आज अपनी  पुरानी कहानी याद करने लगे थे |

        मुझे इस बात का एहसास हुआ तो मैं पुरानी  बात जानने का प्रेमी , दादा जी के जीवन का सार तथा उस वक्त की मस्ती जानने की आकाँक्षा से  उनके पास आकर अक्सर बातें करता आज भी वैसे ही किया |
 
पाँव लागू दादा जी। .......   दादा  जी ने कोई जवाब नहीं दिया शायद अपनी यादों की नदी में गहरा उतर गए थे इसलिए मेरी आवाज उन तक न पहुँच सकी | मैं  धीरे-धीरे कदम बढ़ाते उनके पास तक जा पहुँचा |
       मैंने देखा दादा जी की आँखे आँशुओ में तैर रही थी { विज्ञान बताता है की जब आदमी स्वप्न या यादों में तड़पता है तो आँखें ज्यादा तेजी से घूमती है |} एक बार तो मेरा मन हुआ की दादा जी को न छेड़ू , पर मन तो चंचल दुसरे पक्ष लेकर हाजिर हुआ, शायद इस अवस्था में दादा जी कुछ गूढ़ बातें बता दे , इसलिए मैंने उनके बाँयें बाँह को पकड़कर झकझोरा ,
      दादा जी , दादाजी। .......
दादा जी सकपका के उठ गए , उठते ही थोड़ा झल्लाये पर तुरंत ही सहम गए जैसे कोई बुरे सपने से जागकर स्तब्ध रह जाता है  |
       मैंने  फिर कहा क्या हुआ दादा जी ? आप मनिया और गुड्डू क्यूँ चिल्ला रहे थे हमें भी बताओ न  ?
दादा जी ने कहा  नहीं कुछ नहीं तुम जाओ  मुझे आराम करने दो |
       मैंने कहा नहीं कुछ  तो बताओ ?
दादा जी ने सिराहने पड़े गमछे को उठाया और सर पे लपेटते हुए बोले - बेटा अगर कोई मेरी गरीबी की सटीक- सटीक व्याख्या करें न तो एक छोटा मानस तो मेरे ऊपर भी बन सकता है , ये कहते हुए दोनों पैर चारपाई से निचे झुका लिया और बोले ,बैठ जाओ आज सुनाता हूँ तुमको ----

       नारियल के छिलके की ओरदवन थोड़ी चुभती है पर कहानी सुनने का प्रेमी मैं ये दुःख सहने को तैयार था |
जानते हो पहले यहाँ कुछ नहीं हुआ करता था यहां एक छोटा पोखरा था बाकि उसके आस पास झाल झँखाट हुआ करती थी अंग्रेजों के आने की सूचना मिलाने पर तुम्हारी दादी गहने तथा खेल्लन और बलदेव को लेकर यहां पर छुप जाती थी पर धीरे धीरे यहां कितनी सफाई हो गई और हम यहां आज बैठे है ,
      पर दादा जी ये खेल्लन और बलदेव कौन है ?
दादा जी थोड़ा रुके ,  फिर कहा तुम्हारे पापा के बड़े पापा , पर पता नहीं कौन सी बीमारी हुई की दोनों लोग साथ छोड़ गये |
 
फिर हमारे पापा के पापा ? 
     वो तो बलदेव से भी छोटे थे , वही बचे थे इसलिए उनकी जल्दी शादी कर दी जिसके बाद तुम्हारे पापा का जन्म  हुआ |
   अच्छा ! फिर क्या ?
मैं और तुम्हारे पापा के पापा पुर हाँकते थे , तुम्हारी दादी घर तथा खेत के काम में हाँथ बटाती थी | हम सब की इतनी अथक मेहनत करने के बाद भी पूरा साल भर का आनाज जुटाने में नौ नरी सूत लगता था ,
अंत तक लाला जी का दरवाजा खटखटाना पड़ता था | एक गाय थी जिसके बछड़े जीते ही न थे , इसलिए ज्यादा दिन दूध भी नहीं होता था  , फिर किसी तरह कष्ट कसाले में जीवन बीतता था | खेती के बीज तथा उधारी बढ़ते -बढ़ाते , लाला जी ने तीन बीघे खेत अपने नाम करवा लिये , अब आनाज और कम उगता था जिससे खाने की कमी होने लगी , पर ये बड़ा अच्छा हुआ की तुम्हारे पापा (संतु ) की जिल्ले पे नौकरी लग गयी | बेतन तो कुछ खास नहीं पर उसका भोजन बचने लगा |
       पर एक रात घर आने के चक्कर में संतु रस्ते के कुँए में गिर गया और उसकी मृत्यु हो गयी , नसीब भी क्या जाल बिछा कर  बैठी थी इतनी बार उस रस्ते से आते जाते कुछ नहीं हुआ , उसी रात क्या बुरा हुआ कुछ पता नहीं | सन्तु के जाने के बाद तुम्हारी दादी आखरी बेटे के जाने का दर्द न सह सकी और खुद भी भगवान को प्यारी हो गयी |

       इतनी मौत देखने के बाद और फिर उनका क्रियाकर्म साथ -साथ रोटी पानी का जुगाड़ , ये सब कैसे किये सिर्फ मैं हि जानता हूँ |  इन सब कामों को करने में बाकि बचे सारे खेत या तो बिक गए थे या गहने रखने पड़े |

अब सिर्फ सन्तु की मेहर थी और मैं ही घर में बचे थे , वो तो भला हो कलशा का बहु की देखभाल कर देती थी उससे कुछ बातें कर लेती थी वरना तो वो भी बेचारी मर जाती और खानदान का पूर्ण विराम हो जाता |

     पर पूरे जीवन में नशीब ने एक जगह साथ दिया की बहू ने लड़के को जन्म दिया वो भी स्वस्थ , वरना मैं इस छप्पर में ऐसे नहीं मर रहा होता बल्कि खुले आसमान के निचे किसी चिंता की तार को पकड़कर झुलस गया होता |












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दादा ( जगमोहन )  और दादी ( कमलावती )
पुत्र - खेल्लन , बलदेव , संतु   ( सिर्फ संतु की शादी हुई जिनसे सुमेर का जन्म हुआ )
पौत्र - सुमेर ( सुमेर के चार बच्चे
पनती -मुनिया , गुड्डू , बेचू ,शंकर

पूरी कहानी पढ़ने के लिए आपका  बहुत -बहुत शुक्रिया | 

गुरुवार, 21 मई 2020

नयी कविता ( Nayi kavita ...

नयी कविता ( Nayi kavita ...
https://prankeparinde.blogspot.com/2020/05/rubai.html







सुमित्रानंदन पंत  जी के जन्म दिवस (20 may )पर उनकी एक प्रमुख रचना -
जग-जीवन में जो चिर महान,
सौंदर्य-पूर्ण औ सत्‍य-प्राण,
मैं उसका प्रेमी बनूँ, नाथ!
जिसमें मानव-हित हो समान!
जिससे जीवन में मिले शक्ति,
छूटे भय, संशय, अंध-भक्ति;
मैं वह प्रकाश बन सकूँ, नाथ!
मिट जावें जिसमें अखिल व्‍यक्ति!
दिशि-दिशि में प्रेम-प्रभा प्रसार,
हर भेद-भाव का अंधकार,
मैं खोल सकूँ चिर मुँदे, नाथ!
मानव के उर के स्‍वर्ग-द्वार!
पाकर, प्रभु! तुमसे अमर दान
करने मानव का परित्राण,
ला सकूँ विश्‍व में एक बार
फिर से नव जीवन का विहान! 


मेरी लिखी कुछ रचनाये - 





सच  कहूँ  तो  खोजो  मत 
आनन्द  कहाँ  से  होता  है
फूल  के  यौवन  का  सुंदर
विस्तार  कहाँ  से  होता  है 

नदियों  का ये  बहता  पानी 
बेताब  किस  लिए  होता है
मृत्यु  सत्य  है  तो  जन्म का
अधिकार किस लिए होता है

सच   है  यही  की  कस्तूरी 
हर  मृग  के  अंदर होता है
पर नाजाने  क्यूँ  दुविधा में 
वो जंगल-जंगल  ढूँढता  है

बाहर की खुशियों के पीछे
अंदर का आनन्द मर जाता है
राम को राम बनने से पहले

घर का दशरथ मर जाता है






साँस की ये चुभन कुछ कहती हमें 
दिल का मंजर विराना हुआ है अभी 
मेहंदीओं की कहानी लिखी थी कभी  
डोलीयों से रवाना, कोई हुआ है अभी।

मन के उलझे तपन कि ये कोमल हवा 
बन आंधी बुलाने गई है अभी 
तुमने धोया है गेसु सुना है अभी 
रात इतनी दीवानी हुई है तभी 

सर्द मौसम की भीगी हुई रात में 
उस टूटी-फूटी पड़ी खाट में 
मैं तो चादर संभाले पड़ा हूं अभी 
तेरी यादें मनाने पड़ा हूँ अभी
साँस की ये चुभन कुछ कहती हमें 

दिल का मंजर विराना हुआ है अभी







तिनका-तिनका जोड़ लिया फिर 
कुछ ऐसा बंधन जोड़ दिया फिर 
सपनों की गांठ बांधने से पहले 
दुनिया दारी को छोड़ दिया फिर 

यह नीरवता जो आज बंधी है 
पहले गूँज हुआ करती थी। 
हर एक के चेहरे पर खुशियों की 
बूंद बन बरसा करती थी। 

ये कलरव गुंजन विहगों के 
पहले मुझसे बात किया करते थे 
स्वप्न का मतलब क्या होता है 

ये हमशे पूछा करते थे ।।


धन्यवाद कविताओ को पढ़ने के लिए | 

गुरुवार, 7 मई 2020

RUBAI

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रुबाई   ......  




उर्दू फारसी में एक प्रकार की मुक्तक कविता जिसमें चार चरण या मिसरे होते हैं और जो प्रायः हजाज नामक छंद में होती है। इसमें तीसरे चरण या मिसरे को छोड़कर शेष तीनों में काफिला और रदीफ दोनों होते हैं। फारसी में इसे 'तराना' भी कहते हैं। रुबा होने की अवस्था या भाव।


कुछ उदाहरण :- 


कुछ वक़्त से एक बीज शजर होता है
कुछ रोज़ में एक क़तरा गुहर होता है
बंदा-ए-ना-सबूर तेरा हर काम
कुछ देर में होता है मगर होता है। .. अमजद हैदराबादी

दुनिया के हर एक ज़र्रे से घबराता हूँ
ग़म सामने आता है जिधर जाता हूँ
रहते हुए इस जहाँ में मुद्दत गुज़री
फिर भी अपने को अजनबी पाता हूँ। अमजद हैदराबादी

इस जिस्म की केचुली में इक नाग भी है
आवाज़-ए-शिकस्त-ए-दिल में इक राग भी है
बेकार नहीं बना है इक तिनका भी
ख़ामोश दिया सिलाई में आग भी है। अमजद हैदराबादी

हर महफ़िल से ब-हाल-ए-ख़स्ता निकला
हर बज़्म-ए-तरब से दिल-शिकस्ता निकला
मंज़िल ही नहीं यहाँ मुसाफ़िर के लिए
समझा था जिसे मक़ाम रस्ता निकला .... अमजद हैदराबादी

मिलना किस काम का अगर दिल मिले
चलना बेकार है जो मंज़िल मिले
वस्त-ए-दरिया में ग़र्क़ होना बेहतर
उस कि नज़र में के साहिल मिले। ...... जगत मोहन लाल रवाँ

मेरी लिखी कुछ रुबाई.........









 मेरा किरदार ऐसा है कि रंजिश भूल जाता हूँ
कोई अगर प्यार से देखे तो मंजिल भूल जाता हूँ
अचानक मोड़ पर अगर कभी मैं तन्हा हो जाऊँ
तो आया था किधर से मैं वो राहें भूल जाता हूँ



एक उम्र के बाद वो  मोहब्बत नहीं होती 
शाम गुजर जाए तो फिर रग़बत नहीं होती 
मैं खुशबूओं का व्यापार तो कर लेता लेकिन 
अगर पहले ही फूल से बेवफाई मिली नहीं होती।



 नहीं आसां नहीं है दिल के बागों को हरा रखना 
पसीने में नहाकर हर फूल से आशना रखना 
इन कुर्बत के दिनों में अक्सर बहुत से टीस उगते हैं
मगर फकत ये मानकर मोहब्बत,सभी से दिल जवां रखना।



 तू है मासूम और ये दवाई बहुत है 
दिल-ए-बीमार को तन्हाई बहुत है
कल एक नर्स ने बस लगाया था मलहम
आज उस जख्म की भरपाई बहुत है



 गुलबदन, गुलफाम या कोई और नाम लिखूँ
अब तू ही बता इस चेहरे का क्या अंजाम लिखूँ
कल एक तितली ने छेड़कर कहा मुझसे
तू है मखमली तो मैं अपना क्या नाम लिखूँ



 हमारे बीच कोई वादा भी नही है
क्या करें इश्क़ अभी आधा भी नहीं है
तू सितम भरी निगाह से मत देख किरदार को
दिल में खिले फूल कोई ज्यादा भी नही है


वो उसूल बदल गए , वो सिलसिले नही रहे
अब सात जन्मों की मोहब्बत वाले लोग नही रहे ,
एक हफ़्ते में शुरू होकर ख़त्म हो जाती है कहानी
अब  उतने  बड़े  किरदार  वाले  लोग  नहीं  रहे


इश्क बेवफाई और ये सितम क्या कहें
हम तुमसे मिलने का एहसास क्या कहें
अब तो ख्वाब में भी हो रही है बातें तुम्हारी
अब इससे आगे की तड़प क्या कहें


जब तक रहेगा आँखों में पानी 
याद रहेगी तुम सब की कहानी 
सच में सौभाग्य था जो तुमने पाया 
जो काम आयी वतन को तेरी जवानी


गुनहगार है तेरे जो काबिल नहीं हुए
ऐ मातृभूमि तेरे दर्द में हम शामिल नहीं हुए
हर ओर उठ रही थी बस नफरतों की आग
मगर फिर भी किसी ज़ुल्म में हम शामिल नहीं हुए

बस इतना सा एहसास जताना है तुमसे 
फूलों का एक ख्वाब बताना है तुमसे
तुम उतर चाँदनी की रस्सी से सुनो तो
इस दिल का एक हाल बताना है तुमसे

बस इतना ही नहीं कि मुझे दवा नहीं देते
ये चारागर मुझे जीने की सजा नहीं देते
हाँ है ये जुल्म की किया मोहब्बत मैंने उनसे 
जो मुझे मरने की दुआ भी नहीं देते

महिला पुरुषों को जरूर समझती है
पर खुद को दुनिया की एक भूल समझती है
जब तक इसके ख़्वाब आँखों से ना छलकें
तब तक खुद के दामन को बेनूर समझती है

: तजुर्बों  के  सफर  की  सहर  हो  ही  गई 
हर चीज को देखने की पैनी नजर हो ही गई 
इतनी  उम्र  बीती  है  मेरी  इस  खदान  में
कि ,हर तरह के कोयलों से मेरी पहचान हो ही गई

आँख से ओझल हुए तारों की बातें कौन करता 
तुम ना होते तो, गुजरे जमाने की,बातें कौन करता 
मैं तो चल संभाल लेता दिल को तड़प से तुम्हारी 
मगर,इन नादान आँसुओं की रहनुमाई कौन करता?

" सब कुछ पाकर भी उदास रहते हैं
कुछ लोग जिंदगी के इतने पास रहते हैं
हर वक्त सपनों की मीनार पर चढ़कर
वहाँ से कूदने को बेताब रहते ;

प्यार के किस्से या कहें कहानी नहीं लिखते 
जो बुद्धिमान है वो अपनी जवानी नहीं लिखते 
बढ़कर ओढ़ लेते हैं कोई चोला सयानों का 
कभी क्या-क्या हुई थी खुद से नादानी नहीं लिखते।

सर्द बूँदों का छींटा उड़ाते चले 
वो अपनी आंखों से मुझको चिढ़ाते चले 
मैं नशे में रहूं कैसे हर पल नहीं 
जब वो अपनी आँखों से मुझको पिलाते चले

सोच रहा हूँ कैसा लगता है 
पिता के सीने से जब सर लगता है 
बड़ा होना कोई गुनाह नहीं
फिर क्यूँ ऐसा करने से डर लगता है ,

: हर सितम को गवारा नहीं कर सके 
हम फिर मोहब्बत दोबारा नहीं कर सके 
उनकी यादों की ठहरी हुई चांदनी 
में उठकर खसारा नहीं कर सके 

खिली होंगी और भी कई नाजुक कली 
पर हम मौसम का तिजारा नहीं कर सके 
दूध में जैसे गिरकर घुल गया हो गुलाल 
ऐसी सूरत को इशारा नहीं कर सके


सबा जैसे सुबह की रौनक देखे 
वैसे ही मेरी आँख तेरा तबस्सुम देखे
देखा नही अगर किसी ने वो पाक ज़मज़म
तो , आकर वो तेरी आँख का पानी देखे

मेरे महबूब तेरी आँख सा तारा नही मिलता
मैं उतरा हूँ जिस दरिया में वहाँ सहारा नहीं मिलता
मिलता तो है चेहरा  तुझसा ही एक फूल का
मगर तेरी खुशबू का वो जरिया नही मिलता


कयामत जिस्म तेरा मेरी आँख का पानी न बन जाए
खुदा करे तेरी चाहत का कोई शानी न बन जाए
फ़क़त एक आग है मुझमें  जिसे एक दरिया बनना है
बशर्ते नाम पर मेरे पहले ही कोई कहानी न बन जाए


हर दुआ कुबूल हो जरूरी तो नहीं
हर शाम की सहर हो जरूरी तो नहीं
मेरे दिल में जो था कल वो यादों का गुबार
आज वो तूफ़ां में शुमार हो जरूरी तो नहीं


: नए शिकवों के पुराने किस्से उछाले जाते हैं
जब इरादे बीच के होते हैं तो सिक्के उछाले जाते हैं
जब अपनी क़ौम की सच्चाई कहीं मर जाती है
तो दूसरों की कौम के सच मिटाए जाते हैं








 मेरे लबों पे खामोश रख देना
तुम उसके होठों का हिसाब रख देना
मैं उसके बदन को जब छूना चाहूँ
तुम मेरी उंगलियों पे आग रख देना


साथ तेरा भी अब कुछ सच्चा नहीं लगता 
ये दुनिया का खेल मुझे अच्छा नहीं लगता।
कल एक तनहाई ने बुलाकर कहा मुझसे
तू साथ भी है किसी के मुझे ऐसा नहीं लगता।।


होठों को शहद की लत लगा रखा हूँ
मैं अब इश्क़ की हद लगा रखा हूँ
वो भी पूँछ रहे हैं अब मेरे दिल का पता
 जिनको मैं अपने सिने से लगा रखा हूँ


" जीवन की इस गहराई में क्या-क्या इतिहास नहीं बनते 
जो सोचती हैं दुनिया सिर्फ वहीं तक अल्फाज नही बनते
कर देती है कुदरत कभी जिंदा कभी मुर्दा किसी को 
पर बस इतने बिखरे जज्बातों से सारे एहसास नहीं बनते "


समुंदर भरा आँचल जरा लाओ कोई 
मेरे ख्वाब का बादल जरा लाओ कोई
मैं फैले अँधेरों का जश्न मनाना चाहता हूँ
तुम इसका सामान जरा लाओ कोई


खुदाया ये जवानी सौगात सी लगती है
किसी बूझे हुए किस्से के जज्बात सी लगती है
औऱ लगती है तेरे आने से दिल की डोर ऐसे 
जैसे कोई डाली हरसिंगार की लगती है


इल्म ऐसा की सोगवार नहीं होता 
मुझसे मिलकर कोई ख़बरदार नही होता
ये तो तारीखें हैं कैलेंडर की बस बदल जातीं हैं
वरना तो मिरे हिस्से में कोई इतवार नहीं होता


सूख गए गुलाब मगर महकना नहीं भूले 
हम अब भी तेरी याद में बहकना नही भूले
हम भूल गए वैसे तो तारों की गिनती
मगर अब भी तेरी पलकों का झपकना नही भूले


इश्क़ हर किसी की आँख नमकीन नही करता 
दिवानगी का काम कोई ज़हीन नही करता
हाँ करता मोहब्बत वही इस दुनिया में
जो किसी के जज़्बात की तौहीन नही करता





 जुगनू कई निकले हैं तेरी तलाश में देखो
बदले-बदले से हैं रंग आसमा के देखो
हर आँख में झलक रही है एक गुलशन की तमन्ना 
जिस तरफ से आ रही है तेरी खुशबू जरा देखो


किताब के खुलते पन्नों सी नज़र आती है ,
आपकी मुश्कान हमें अपनों सी नज़र आती है,,
खिलते हैं कुछ फूल जो बहारों में कभी-कभी ,
आप उन फूलों की खुशबू सी नज़र आतीं हैं ,,


नफरतों को जलाकर ख़ाक कर दूँगा ,
मैं एक दिन खुदको बेबाक कर दूँगा ,,
तू मुझे यूँ अधूरी हसरतों से मत देख ,
मैं एक दिन खुद को तेरे नाम कर दूँगा ,,


खुद को निखारने के लिए क्या-क्या नहीं होता 
लगाने के लिए सिर्फ़ मस्कारा ही नही होता 
छुपा लेते हैं वो अपने चेहरे को सिर्फ एक ब्रस से
जिनके पास कभी रखने को दुप्पटा नही होता


नशों में अँगारो के कुछ उबाल लिए होंगें
सर पर चमकता हुआ एक भाल लिए होंगें
तुम मिलकर कभी देखना हम भारतीयों की आँखों में
हम अपनी आँखों में विजय का इंतजाम लिए होंगें


मोहब्बत की कोई मिशाल नही होती
अच्छे लोगों के लिए,मजहब की तलवार नही होती
जो जीते हैं हर पल, इंसानियत के लिए
उनकी कोई और अलग , जात नही होती


इन होठों के छालों का दर्द मनाऊँ क्या  
   मैं तेरे पास फिर आ जाऊँ क्या 
तुम मुझे देखे फिर उसी नजर से  
  मैं तुझमें फिर वैसे ही डूब जाऊँ क्या


आँखों से ये कर्ज अता नही होगा 
अब  तू  मुझसे जुदा  नही   होगा 
मेरे दिल की फितरत ही कुछ ऐसी है
इसमें अब दूसरा खुदा नही होगा


कुमकुम सी माथे पर जैसे आभा की मुश्कान रहे
हाथों में खुशियों के पल की मीठी सी बरसात रहे
रहें कानों में  शब्द जीत के  आँखों में विश्वास रहे 
आपके सामने इस धरती का नतमस्तक सँसार रहे


दौर-ए-जमाने की साज़िश में नही रहते 
अच्छे दोस्त हर किसी के हिस्से में नही रहते
रहतें हैं कई फूल एक चमन में लेकिन
हर फूल में ख़ुशबू के किस्से नही रहते


चाँद न सही पर सितारें तो मिले तुझे
जिंदगी इस कदर दे सिले तुझे
तू मुश्कुराये तो छाए बर्क-ए-रोशनी
तू रूठ जाए तो लगे हादसे मुझे 

अभी  है  वक़्त  आपका  तो  इतराइए  नही 
लहजा  बदल - बदल कर  हमें डराइए नही
देखें  है  कई  आपसे  औऱ  के  भी  दौर  हमनें
मिले थे किस कदर ख़ाक में वो, याद दिलाइए नही


तक़दीर की शिनाख्त को ही कर्म कहा करते हैं ,
मौत की पहचान हो जिससे उसे शमशान कहा करते हैं ,,
औऱ ये दुनिया झुठी है जिसके लिए चंद पैसों के सिवा ,
ऐसे पैसों पे मरने वालों को अनजान कहा करते हैं ,,


जख्मों के दाग सँजोती रहती
वो मेरे पास आती जाती रहती
इन नम होती पलकों का ये सिला होता
उसके चेहरे की तस्वीर आँख में बनती रहती


आँखों में प्यार का रंग तरस रहा है
उससे मिलने को दिल बरस रहा है
ख़ामोश है जुबा उसकी आवाज़ के लिए
जिसकी चाहत में दिन आवारा गुजर रहा है


दिल के गमले में लगे प्रेम कली का खिलना जैसे 
साँसों की हवा में खुद से खुशबू का हो मिलना जैसे
मन के इस अँधियारे में बिछड़े सारस का हो दिखना जैसे
तुझसे मिलकर लिखा जाता है चाहत का तराना जैसे


आसमा की ज़द से सितारा आ गया
धरती पे जन्नत का नजारा आ गया
बिखरी है खुशबू ऐसी हवा में 
जैसे आप के होने का इशारा आ गया


बिखर कर जुल्फ ने शाये बदल दिए हैं
मासूमियत ने झील के साहिल बदल दिए हैं
बदल दिया है वक़्त ने हम सब को इसकदर
जैसे किसी ने अपने घर के पते बदल दिए हैं


फिर वही कबूतरों का जमाना याद आया
तुम गए तो फिर , वो बहाना याद आया
आँखों में रही एक कसक देर तक
फिर,आँशुओँ के साथ तेरा चेहरा निकल आया


सितम के फूल इशारों से छड़ जाएँ
चाँद तुझे देखे तो शर्मा के बिखर जाए 
रहे खुशी तेरी आँखों में ऐसी हर वक़्त
जैसे कोई अपनी खोई चीज पा जाए


मोहब्बत की ग़ुलामी में जिंदा रहेंगें 
जो लोग इस ज़माने से शर्मिंदा रहेंगें
देखेंगे हर तरफ़ पलकें झुकाकर
फिर मेरी तरफ चाहत से ऊँचा करेंगे


यादों  का  तालाब  बना  रहा  हूँ
मैं  खुद  को  शैलाब  बना  रहा  हूँ
जिसे पढ़कर कोई  समझ न पाए
मैं ख़ुद को ऐसी किताब बना रहा हूँ !


किश्मतो के जोकर कभी काम तो आएँगे
जवानी में अपने भी कभी काम तो आएँगे
इन ग़ुलाबी गालों का कभी मलाल मत करना
ये तो फूल हैं , ये एक दिन तो मुर्झाएँगे


Apni hasrato ka ,shringar kar leti h ...
Aurat khud ko  kitna, najarandaj kar leti h..
Pahankar chudiyan kisi aur ke ,chahat ki...
Khud se, kitna bada gunah kar leti h....


मेरे इश्क़ की कहानी छपी होगी ।
आज अखबारों में जवानी छपी होगी।।
हर कोई पढ़कर बस यही सोच रहा होगा।
उसने कैसे ये कहानी लिखी होगी ।।


बचपन को जवानी मार देती है ।
हम सब को तरक़्क़ी की कहानी मार देती है।।
हर कलि बड़ी शिद,दत से फूल बनती हैं ।
मग़र हर फूल को ख़ुशबू की रवानगी मार देती है ।।


तेरी यादों की फटी डायरी को तौफा मिल गया ।
आजकल मुझे लिखने को एक सोफ़ा मिल गया ।।
दूर घर मचान से एक परिंदा क्या उड़ा ।
गाँव वालों को तो बस,बोलने का मौका मिल गया ।।


इन नये सितारों को चमकना कौन सिखाता होगा ।
रात के बाद सूरज को फ़िर जलना कौन सिखाता होगा ।।
ये हवा ये ख़ुशबू ये समय का बंधन ।
इन सब को खुद से रूठ कर चलना कौन सिखाता होगा ।।




बहुत ढूँढा पर वो दवा नहीं मिली ।
माँ के साँसों में जो थी ,वो हवा नहीं मिली ।।
जख़्म नाराज़ होकर फ़ैल गए बदन में ।। 
जब उनको माँ के हाँथों की वो दुआ नही मिली ।।


मेरी आँखों ने कुछ खून सा निशान देखा ।
आज रात,जुदाई का स्वप्न बार-बार देखा ।।
जानता था नाजुक है ,दिल मेरा मग़र ।
फूल से जख़्म खाते,आज पहली बार देखा ।।


लहु के हर कतरे ने जो कहानी लिखी थी ।
खुले आसमा में चलने की ,जो मेहरबानी लिखी थी ।।
बेंच रहे हैं उसी को आज चंद लोग ।
जिस वतन के लिए शहीदों ने अपनी, जवानी लिखी थी ।।

इन नादानों को मुझमें अपना खानदान दिखता होगा ।
या तो , मुझमें कोई अच्छा इंशान दिखता होगा ।।
ऐसे ही नहीं बैठता कोई किसी के कंधें पर ।
जरूर उनको मुझमें कोई  मेहरबान दिखता होगा ।।


 गुनाहों का भी एक अदब होता है ,
तेरा चला जाना भी अजब होता है ,,
मैं रोता हूँ ख़ुश होता हूँ तेरी यादों में ,
तेरी याद का आना भी गजब होता है ,,


मोहब्बत के निशान दिखते हैं क्या ।

होठों के कटे ईमान दिखते हैं क्या ।।
आइना देखकर तुम शर्माते क्यूँ हो ।
आइने में हमारे अक्स दिखते हैं क्या।।



ज़मानत की एक दलील थी उसे वापस चाहता हूँ ,
मैं अब उसकी गली में दोबारा जाना चाहता हूँ ,,
हाँ माना कैद हो जाऊँगा उम्र भर के लिए ,
मग़र ऐसे भी नहीं  यूँ तन्हा  मरना चाहता हूँ ,,


तुरन्त जन्में बच्चे का मर जाना 
कोई नहीं जानता ये गम जाना ,
जो तुमने देखी है माँ के चेहरे पे उदासी 
वो देखने को बहुत  है कम जाना ,,





इश्क़ में उसके दिए अफसाने का क्या करें.........
चाँद की आँख सूरज का मैखाना है तो क्या करें..
इन खड़ी मूर्तियों की तहजीब न देखा करो........
ये जो तुम्हें देखकर पलकें न झुकाएँ तो करें......👌



नये काँच लाते थे तो चुना लगाया करते थे ।
पिता जी हमको कभी-कभी समझाया करते थे ।।
नयी रोशनी दुनिया में लाने से जरा पहले ।
दामन को थोड़ा और चमकाया करते थे ।।

तेरे बाद किसकी दुआएँ करेंगे
फिर मंदिर यूँ ही आया जाया करेंगे
हम भी खड़े होकर बाजार में अक्सर
क़िस्से कहानी सुनाया करेंगे ।


ये इल्जाम है मुझपर कि कोई इल्जाम ही नहीं 
मैं वो रास्ता हूँ जिसका कोई अंजाम ही नहीं
और मेरे क़त्ल की जानिब लिखा है उसका नाम
जिसनें कभी आँखों के सिवा किया कोई वार नहीं .



साँसों के सफ़र में भी तन्हाई है ,
अब तो आजा की तेरी याद बहुत आई है ,,
हाँ माना जीने के इरादे हैं अभी जिंदा मगर ,
इन इरादों में चमक तेरे दीदार से आई है ,,

दर्द-ए-दिल सुना नहीं उसनें
इसलिए मुझको चुना नहीं उसने 
कुछ इश्क़ कुछ मोहब्बत कुछ चाहत
इससे ज्यादा कुछ किया नहीं उसनें ,,


दिल के शिकवे को भुलाया नहीं करते
नाराजगी में कहीं आया जाया नहीं करते
मजबूर करता है तुम्हारी आँख का पानी वरना
हम किसी रूठे को मनाया नहीं करते !


पुरानी कमीज़ में रख्खा हुआ गुलाब लगता है ।
बीते जमाने का बिगड़ा हुआ नवाब लगता है ।।
देखों उसके चेहरे पे आती हुई झुर्रियां ।
जैसे वक़्त की खिड़की का हिज़ाब लगता है ।।



क़ीमत उसके आँसुओ की मैं क्या चुकाऊँगा ।
मैं तो एक परिंदा हूँ, बस जल जाऊँगा ।।
वो देखेगी मुझको बस तड़पते हुए ।
इसी एहसास से मैं मर जाऊँगा ।।



तेरी यादों का दीपक जला के बैठे हैं ।
तुझे अपने मन मन्दिर में बसा के बैठे हैं।।
अब तू आये या चाहे न आये, पर
तुम्हारे हर लम्हें को दिल से लगाये बैठे हैं ।।


क्या बताऊँ चाहत ने क्या क्या बना रखा है ।
एक अदने से कुत्ते को लँगड़ा बना रखा है ।।
एक उम्र तक फिरा जिसके साथ साथ वो ।
आज उसी उम्र ने उसको छोटा बना रखा है ।।



हर नज़र-ए-नूर में ,वो सुरूर नही है ।
जिसे मैं टूटकर चाहूँ ,वो ग़ुरूर नही है ।।
जिसको देखते देखते आँखें सूख जायें ।
वैसे चेहरे की यहाँ कोई तस्वीर नहीं है ।।


मोहब्बत के तौर तरीक़े भूल गयी ।
कुछ बात बताना तो कुछ बता कर भूल गयी ।।
             औऱ...
ये एक मेरा दिल है जिसे मैं कहुँ तो क्या ,जिसे वो 
कभी रूलाना तो कभी चुपकराना भूल गयी ।।



तू जाकर इस दुनिया से ये क्या दे गया ।
आँखों में लहू सा कुछ आँशु दे गया ।।
आ लौट आ फ़िर ,उसी राह से।
जिस राह से तुझे भगवान ले गया ।।
😢😢😢😢😢भाई आँसू मेरे यार  .....😢


दिल के रोंये खड़े हो जाते है ।
वो जब आगे आकर खड़े हो जाते हैं।
कैसे न डगमगाने ईमान मेरा ।
वो जो उछल-उछल कर घर जाते हैं ।।



मेरे बाद मोहब्बत का दौर ख़त्म हो जाएगा ।
जीते जी आत्मा से मेल खत्म हो जाएगा ।।
गुलाब तो खिलेगा इन बहारों में मग़र ।
उनसें ख़ुशबुओं का मेल ख़त्म हो जाएगा ।।


अबकि बार इश्क़ का चलन कुछ नया है ।
शाम है पुरानी पर सुबह कुछ नया है ।।
फ़िर वही पराठे औऱ आचार रखी सब्ज़ी ।
पर अबकी बार बोतलों का पानी कुछ नया है।।
  


दिल भी कोई चीज है पता न था ।

मन कैसे बेचैन होता है पता न था ।।
जब तक नही देखा था मैंने तुमको ।
प्यार क्या होता है पता न था ।।


ना तो तरकस ना तो तीर  फिर भी जख़्म बना पड़ा है ,,
जिससे हुई थी मोहब्बत , उसी से उल्फ़त मरा पड़ा है 
उसे नहीं भरोसा ना तो दीदार की है चाहता ,
मेरा दिल बेचारा फिर भी बीमार बना पड़ा है ,,


अंतिम पाले के प्यादे भी वज़ीर होते हैं ।
कम न समझा करो उनको जो गरीब होते हैं।।
तुमने देखी नहीं दुनिया कभी पल्लू से बाहर ।
हर ताबूत में हम ही आखिरी कील होते हैं ।।



सुरूर चाँद का सब की नज़रों में ,इसलिए होता है ।
क्योंकि वो कभी आधा तो कभी पूरा होता है ।।
क़ीमत बना के रखनी है अग़र आँखो में सब के ,
तो थोड़ा मुख़्तसर सा गुस्सा जरूरी होता है ।।


होके बेमौन कुछ बात भी कहा कीजिए ।
जिंदगी एक उम्र है उस उम्र का मजा लीजिए।।
वो चाँद वो चेहरा वो चलनी वो घूँघट।
हर एक बात को पहली रात से जोड़ा कीजिए।।


ये सुराख़ बहुत कुछ बयाँ कर जाता है।
सुबह होते ही दिन को बयाँ कर जाता है।।
औऱ ये जो तुम्हारी याद का फीका सा *तबस्सुम है ।
सच मानो मेरे मन को पूरा मीठा कर जाता है।।
       *मधुर मुश्कान


आवारगी का आलम, कुछ इस कदर हो गया ।
राह का हर मुसाफ़िर ,तेरी तरह हो गया ।।
 ढूँढे तो सच किसमें ,सच कहाँ खो गया
जिस साग़र में हम उतरे उसका साहिल ही खो गया।


क़मर से लिपटा फ़िरदौस देखती है। 
फिर अपने महबूब की आँखें देखती है।।
औरत देखती नहीं सिर्फ़ अपने महबूब को ।
उससे जुड़ी अपनी पूरी दुनिया देखती है ।।
   क़मर-चाँद, फ़िरदौस-ज़न्नत


मन का लिखा आँशुओँ ने धूल दिया ।
सुबह के सूरज को मैंने अँधेरा कह दिया।।
बजी एक घंटी तो दौडा फ़ोन उठाने ।
लगा मुझे ऐसा की, उसने मुझे माफ़ कर दिया।।


मेरा इश्क़ अपने पे गुमान करता है ,
वक़्त बे वक़्त उसका एहतराम करता है ।
उसकी एक याद है जिसमें  सुबह  ,,
औऱ उसी की एक याद में शाम करता है ।।


जुगनुओं के दीवाने जलते नहीं है ।
चिरागों के आशिक़ बचते नहीं है ।।
है शौक जिसमें मोहःब्बत का तो फ़िर ।
वो इतना दिमाक लगाते नहीं है ।।


बहुत हुआ मोहब्बत अब काम होगा ।
मरने से पहले अपना भी नाम होगा ।।
वो भी देखेंगें अपने जमाने ।
जिस जमाने में अपना ही नाम होगा।।


तुझसे मोहःब्बत का ये अंजाम निकला ।
मैं खुद की ही याद में गुमनाम निकला ।।
ढूढ़ता किसे औऱ लाता किस पते पर ।
मैं तो ख़ुद के ही पते पर बेनाम निकला ।।


इतना कम दाम रख्खा है ,मैंने खुद का इस जमाने में ,
कोई उचित नहीं समझता मुझको, खज़ाना बनाने में ।
माना ये राह के फूल आज यूँ ही गिर पड़े हैं ,
मग़र ये भी शामिल थे, किसी रोज़ बहार बनाने में ।।


चाँद को चूम कर चाँदनी बिखेर देती है ।
जैसे बच्चों को माँ फुलझड़ी खरीद देती है।।
जब आता है सावन ,अपने पूरे सबाब पर ।
तब प्रकृति फूलों में ख़ुशबू बिखेर देती है ।।


बूँद की शिकायत बादलों से किया करते हैं ।
कितने नादान हैं जो ये ज़ुल्म किया करते हैं ।।
नहीं जानते साज़िश किसकी थी फ़िर भी ।
बेगुनाहों को उम्रक़ैद दिया करते हैं ।।


मंजिलें बदलती है शुरुआत नही ।
तस्वीरे बदलती हैं, हक़ीक़त नहीं ।।
खो सकते हो तुम ,इस दुनिया में मग़र ।
ये दुनिया खो जाए मुमकिन नहीं ।।


न होता आज पागल तो भी हो गया होता ।
उसको खरीदा पायल अग़र खो गया होता ।।
कैसे जागता बिना उसकी एक खनक के ।
मैं ख़्वाबों की मौत में अगर मर गया होता ।।


बहुत रोया हुँ हर *सहर के बाद
 कुछ तेरे आने से पहले कुछ तेरे जाने के बाद ,
और ये नींद जो आती ही नहीं
एक तेरी याद से पहले एक तेरी याद के बाद ,,
           * (सहर-सुबह)



इन लाकिर पे एतबार करूँ या न करूँ ,
तुझ पर विश्वास करूँ या ना करूँ ,,
तूने ही मुझको रुलाया तूने ही मुझको सताया
     तूने ही मुझको हँसाया ,
अब तू ही बता , मैं तुझसे प्यार करूँ या ना करूँ ,,
             


 देर इंतज़ार के ख़ाक होने तक ,
मैंने देखा तुझे उम्मीदें सर होने तक ,,
औऱ ये आग जिसे लोग आँशु कह रहे हैं ,
बहुत बहाये है इनको तेरे आने तक ,,


ख़ुदा तेरी ख़ुदाई का पैग़ाम है ये जिंदगी ,
एक उम्र हुई मोहब्बत का अंजाम है ये जिंदगी ,,
औऱ ये सब लोग जो इसे अपना कह रहे हैं ,
उन सब से दूर जाने का नाम है ये जिंदगी,,


गाड़ी नहीं है न बँगले हैं मेरे पास ,

क़िस्मत देखों कुछ भी नहीं है मेरे पास ,,
औऱ वो जिसे लोग अमीर कह रहे हैं ,
उसे वही चाहिए जो हैं मेरे पास ।। ,,


आसमान को सितारों का इनाम मिल जाए ,
हवावों को भी कुछ ऐसा पैग़ाम मिल जाए ,,
औऱ जैसा नाम दिया आपका आपके वालिद ने,
आपको वैसी ही जिंदगी का इनाम मिल जाए,,

ये कौन से गुनाहों की सजा दे रहा है ,
जादूगर क्यूँ खुद पे कोड़े बरषा रहा है ,,
इतना बड़ा ज़ुल्म तो जिन्दगी नहीं है ,
तो फिर क्यूँ खुद को  इतनी सजा दे रहा है ,,


मोहःब्बत हमारी  इस क़दर हो गई ,
जैसे लहरों की चाह साहिल हो गई ,,
हम तड़पते है उस बेजान से दिल के लिए,
जिसकी चाहत मेरी दिलों जाँ में हो गई,,


परवरदिगार माना अँधेरों से डर नहीं लगता ,
पर क्या उजालों पे मेरा हक नहीं बनता ,,
वहीं पास में सूरज वहीं पास में चाँदनी ,
क्या वहीं पास में मेरा घर नहीं पड़ता ,,


अपने कदमों को ,हौशलो का इम्तिहान देते हैं ।
चलो खुद को, परिंदों सा उड़ान देते हैं ।।
थोड़ा सा रंग ,थोड़ा सा आसमां ।
थोड़ा सा तितलियों जैसा, मख़मली अन्दाज देते हैं।।  
अपने क़दमों को हौशलो का इम्तिहान देते हैं-----


चिराग़ था रोशन और ज़माना भी ।
बुझ गए हम और फ़साना भी ।।
वही एक याद का अब साहिल है ।
जहाँ तक है आना जाना भी ।।

फूल को काँटो से नवाजा न करों ।
अपने चेहरे को हिजाबों से ढँका न करों ।।
मैं तो इंशान हुँ फ़ितरत है मेरी ।
........aap pura karo 









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आपका मेरी रूबाई पढ़ने के लिए बहुत बहुत साधुवाद , प्रकृति आपको स्वच्छ सुंदर 
और स्वस्थ बनाये रखे और आप पर्यावरण को |