मंगलवार, 2 जून 2020

GAREEB KA CHHAPPAR

गरीब का छप्पर
GAREEB KA CHHAPPAR

न सूरज उगा न रात हुई ,
मेरी जिंदगी में ऐसी क्या बात हुई ,,

वो हर शाम तितलियाँ उड़ाता रहता है ,
उसकी फूलों से नजाने क्या बात हुई ,,







बणेर पर झूला खाती किसी गरीब की चादर जैसी फटी या कहें चिथड़ी छप्पर , जिसका दामन इतना साफ की कोई दाग था ही नहीं अर्थात उस छप्पर तले चारपाई बिछाने पर आसमान उतना साफ दिखाई देता जितना की पहली बारिश में |

         उसी छप्पर तले मनिया और गुड्डू की याद में लेटे दादा जी आज भी बोल बोलकर सोच रहें हैं | हाय ये बीमारी हमारे कितने बच्चों को खा गई !
    बया के घोषले जैसी चारपाई व् सिरहाने बांध में फसी जर्दे की पोटली , वही पुराना गमछा और बदन पर सफ़ेद धोती का चीर लपेटे दादा जी , शायद दादा जी आज अपनी  पुरानी कहानी याद करने लगे थे |

        मुझे इस बात का एहसास हुआ तो मैं पुरानी  बात जानने का प्रेमी , दादा जी के जीवन का सार तथा उस वक्त की मस्ती जानने की आकाँक्षा से  उनके पास आकर अक्सर बातें करता आज भी वैसे ही किया |
 
पाँव लागू दादा जी। .......   दादा  जी ने कोई जवाब नहीं दिया शायद अपनी यादों की नदी में गहरा उतर गए थे इसलिए मेरी आवाज उन तक न पहुँच सकी | मैं  धीरे-धीरे कदम बढ़ाते उनके पास तक जा पहुँचा |
       मैंने देखा दादा जी की आँखे आँशुओ में तैर रही थी { विज्ञान बताता है की जब आदमी स्वप्न या यादों में तड़पता है तो आँखें ज्यादा तेजी से घूमती है |} एक बार तो मेरा मन हुआ की दादा जी को न छेड़ू , पर मन तो चंचल दुसरे पक्ष लेकर हाजिर हुआ, शायद इस अवस्था में दादा जी कुछ गूढ़ बातें बता दे , इसलिए मैंने उनके बाँयें बाँह को पकड़कर झकझोरा ,
      दादा जी , दादाजी। .......
दादा जी सकपका के उठ गए , उठते ही थोड़ा झल्लाये पर तुरंत ही सहम गए जैसे कोई बुरे सपने से जागकर स्तब्ध रह जाता है  |
       मैंने  फिर कहा क्या हुआ दादा जी ? आप मनिया और गुड्डू क्यूँ चिल्ला रहे थे हमें भी बताओ न  ?
दादा जी ने कहा  नहीं कुछ नहीं तुम जाओ  मुझे आराम करने दो |
       मैंने कहा नहीं कुछ  तो बताओ ?
दादा जी ने सिराहने पड़े गमछे को उठाया और सर पे लपेटते हुए बोले - बेटा अगर कोई मेरी गरीबी की सटीक- सटीक व्याख्या करें न तो एक छोटा मानस तो मेरे ऊपर भी बन सकता है , ये कहते हुए दोनों पैर चारपाई से निचे झुका लिया और बोले ,बैठ जाओ आज सुनाता हूँ तुमको ----

       नारियल के छिलके की ओरदवन थोड़ी चुभती है पर कहानी सुनने का प्रेमी मैं ये दुःख सहने को तैयार था |
जानते हो पहले यहाँ कुछ नहीं हुआ करता था यहां एक छोटा पोखरा था बाकि उसके आस पास झाल झँखाट हुआ करती थी अंग्रेजों के आने की सूचना मिलाने पर तुम्हारी दादी गहने तथा खेल्लन और बलदेव को लेकर यहां पर छुप जाती थी पर धीरे धीरे यहां कितनी सफाई हो गई और हम यहां आज बैठे है ,
      पर दादा जी ये खेल्लन और बलदेव कौन है ?
दादा जी थोड़ा रुके ,  फिर कहा तुम्हारे पापा के बड़े पापा , पर पता नहीं कौन सी बीमारी हुई की दोनों लोग साथ छोड़ गये |
 
फिर हमारे पापा के पापा ? 
     वो तो बलदेव से भी छोटे थे , वही बचे थे इसलिए उनकी जल्दी शादी कर दी जिसके बाद तुम्हारे पापा का जन्म  हुआ |
   अच्छा ! फिर क्या ?
मैं और तुम्हारे पापा के पापा पुर हाँकते थे , तुम्हारी दादी घर तथा खेत के काम में हाँथ बटाती थी | हम सब की इतनी अथक मेहनत करने के बाद भी पूरा साल भर का आनाज जुटाने में नौ नरी सूत लगता था ,
अंत तक लाला जी का दरवाजा खटखटाना पड़ता था | एक गाय थी जिसके बछड़े जीते ही न थे , इसलिए ज्यादा दिन दूध भी नहीं होता था  , फिर किसी तरह कष्ट कसाले में जीवन बीतता था | खेती के बीज तथा उधारी बढ़ते -बढ़ाते , लाला जी ने तीन बीघे खेत अपने नाम करवा लिये , अब आनाज और कम उगता था जिससे खाने की कमी होने लगी , पर ये बड़ा अच्छा हुआ की तुम्हारे पापा (संतु ) की जिल्ले पे नौकरी लग गयी | बेतन तो कुछ खास नहीं पर उसका भोजन बचने लगा |
       पर एक रात घर आने के चक्कर में संतु रस्ते के कुँए में गिर गया और उसकी मृत्यु हो गयी , नसीब भी क्या जाल बिछा कर  बैठी थी इतनी बार उस रस्ते से आते जाते कुछ नहीं हुआ , उसी रात क्या बुरा हुआ कुछ पता नहीं | सन्तु के जाने के बाद तुम्हारी दादी आखरी बेटे के जाने का दर्द न सह सकी और खुद भी भगवान को प्यारी हो गयी |

       इतनी मौत देखने के बाद और फिर उनका क्रियाकर्म साथ -साथ रोटी पानी का जुगाड़ , ये सब कैसे किये सिर्फ मैं हि जानता हूँ |  इन सब कामों को करने में बाकि बचे सारे खेत या तो बिक गए थे या गहने रखने पड़े |

अब सिर्फ सन्तु की मेहर थी और मैं ही घर में बचे थे , वो तो भला हो कलशा का बहु की देखभाल कर देती थी उससे कुछ बातें कर लेती थी वरना तो वो भी बेचारी मर जाती और खानदान का पूर्ण विराम हो जाता |

     पर पूरे जीवन में नशीब ने एक जगह साथ दिया की बहू ने लड़के को जन्म दिया वो भी स्वस्थ , वरना मैं इस छप्पर में ऐसे नहीं मर रहा होता बल्कि खुले आसमान के निचे किसी चिंता की तार को पकड़कर झुलस गया होता |












https://prankeparinde.blogspot.com/


दादा ( जगमोहन )  और दादी ( कमलावती )
पुत्र - खेल्लन , बलदेव , संतु   ( सिर्फ संतु की शादी हुई जिनसे सुमेर का जन्म हुआ )
पौत्र - सुमेर ( सुमेर के चार बच्चे
पनती -मुनिया , गुड्डू , बेचू ,शंकर

पूरी कहानी पढ़ने के लिए आपका  बहुत -बहुत शुक्रिया | 

12 टिप्‍पणियां:

  1. वाह लाजवाब सारे के सारे अच्छे है।

    जवाब देंहटाएं
  2. जय हो बड़े भैया क्या बात है

    जवाब देंहटाएं