महज कहानी के तौर पर न लेना मुझको
मैं इस टूटी हुई दास्ताँ से बहुत ज्यादा हूँ।
तुम मोहब्बत की दुनिया में अभी बच्चे हो
और मैं तुम जैसे बच्चों का दादा हूँ।
सच है ओछा किसी ने सोचा
सच में बड़ी बीमारी है
झूठ की धुनियों में है दुनिया
झूठ की बड़ी तैयारी है
सच बोलो तो बड़ी यातना
दुख से नीरव कोई रात ना
सच की होती कोई बात ना
सच की यही बीमारी है
सच है ओछा किसी ने सोचा
सच में बड़ी बीमारी है
जमीं अपने जख्मों का सम्मान चाहती है।
हर बार अपने खेतों में नए मेहमान चाहती है।
कोई पत्थर से ना ढक दें उसके कोमल चेहरे को ,
इसलिए वो अपना हर बेटा किसान चाहती है।
सामने से समुंदर या विपदाओं का पहाड़ बोलता है।
इंशान सीना ताने श्रीमान बोलता है,
कोई भी हो परिस्थिति ताकत का अनुमान बोलता है।
मगर जब सामने हो भूूख तो सिर्फ किसान बोलता है।
मियां कमाल है पहली मोहब्बत
पहले पहल मुझे पता नहीं था
जबतक जफा की राह का पत्थर
मेरे सर से लगा नहीं था।
चांदनी की ओट में जब रात पैैरहन बदल रही थी
उसकी स्याह बदन की खुशबू ख्वाब सारे बदल रही थी।
मैं तो किनारे खड़ा छत के नजर में तेरी आस लेकर समुन्दरों सी प्यास लेकर
कर रहे हो किनारा तो जताना नहीं
मैं कैसे हुआ था तुम्हारा ये बताना नहीं
कोई बड़ी आंख वाला मासूम दिखे तो
रहम करना उसको पटाना नहीं
अबकी प्यार हो तो बस प्यार करना
यूँ हर बात पर जताना नहीं
काशिद पयामे इश्क पर यूँ ना उम्मीद मत हो
ये बदन सलामत रहा तो इश्क और भी होंगे |
मैं अपने इश्क का बहुत चर्चा नहीं करूँगा।
जमा पूँजी रखूँगा, खर्चा नहीं करूँगा।।
एक दीद के खातिर हम तेरे इंतजार में खड़े हैं
तू अपनी खिड़की से बाहर देख हम तेरे प्यार में खड़े हैं|
बस एक जुर्रत की कहानी नहीं है ,
वरना तो क्या मेरे पास जवानी नहीं है!!
दिल बहलाने का सामान मत बन।
तुम मेरे घर मेहमान मत बन।
मैं अपनी मेहनत की झोपड़ी में रहता हूँ
तू मेरी किस्मत की मीनार मत बन!
हाँ बन रही है कहानी अपनी
मगर तू उसमें किरदार मत बन।
मैं क्या कह रहा हूँ तुझे समझ नहीं आता?
तू मेरे दिल में हिस्सेदार मत बन!
ये जवानी एक दिखावा है
तू बुढ़ापे का इंतजार मत बन!
तू इस दिखावे का सामान मत बन!
कोई कुछ भी कह ले, मगर आस नहीं जाती।
बिना पानी के कभी प्यास नहीं जाती।
हां जाती हैं तुम्हारे जाने के बाद कई बसें
मगर उनको देखकर मेरी जान नहीं जाती।
बहुत जोर से चिल्लाओगे तो गला फटेगा
वो जहाँ है वहाँ आवाज नहीं जाती।
घर की चीजों में दिखा दी गई खिलौने की खुशी
हम गरीब घर के बच्चे बाहर की खुशी नहीं जानते।
ज़हन लड़ रहा है जमाने से इंतगाम की सूरत,
दिल बैठा है सीने में जैसे कोई बात नहीं है।
तुम्हें हारकर दिल का रोशन हुआ कोना,
तुम्हें जीतकर जीनत-ए-अमान नहीं है।
आओ की, इंतजार की बीती कई रातें ,
आओ की इस दिल का कोई हकदार नहीं है।
आईने में देख रहा हुँ रक्स आँखों का ,
दिल डूब रहा है आँसू में कोई बात नहीं है।
वक्त ने उसे और खूबसूरत कर दिया।
अब उसकी मुस्कान दोनों गालों पर और ऊँचे माँसल टीले बनाती है
जिसकी नरमी ऐसी है जैसे बारिश के तेज बहाव में इकट्ठा हुई मिट्टी की तहें
जिसकी छुअन बहुत कोमल होती है और आदमी एक बार फिसल जाए तो उन तहों में धंसता चला जाता है।
बादलों की चादर ओढ़े आसमा जब हवाओं के साथ कदमताल करता
सूरज की लाल सुर्ख गलियों में अपने माधुर्य का नीलत्व घोलता है तो
लगता है मानो! नए प्रेम में आई प्रेमिका अपने पहले चुंबन के एहसास को याद कर रही हो?
उसके बदन में रोमांच की कपकपी सर से लेकर पैर तक दौड़ जाती है।
उसके बदन के मांसल टीले थोड़े सख्त हो जाते हैं जिसका आभास कपड़ों से बाहर आ रहा होता है।
वह बार-बार अपनी निगाहें नीचे करके अपने आप को एक पर्दे में समा देना चाहती है
क्योंकि वह नहीं चाहती की कोई गैर उसकी स्पंदन की रौनक को महसूस करें।
जख्म जब दिल से उतरा तो माज़ी हो गया।
मेरे बदन का हर एक हिस्सा कामकाज़ी हो गया।
उसने इस कदर लहजे में की बात मुझसे
मेरे रूह का हर एक हिस्सा राज़ी हो गया।
सिलसिले ख्वाब के बेकार हो गए।
हम तुमसे बिछड़ कर शहरयार हो गए।
कभी तसल्ली से बैठते थे अपने घर के आँगन में
अब तो घर में भी जैसे बाजार हो गए।
सबसे अजीज रिश्ता भी इस शक्ल में टूटा
हम अपने ही भाई के कर्जदार हो गए।
करते थे जिससे बात हम पहरों पहर पहले
अब उसकी खनक के लिए बेकरार हो गए।
ना जाने वक्त ने क्या खेल कर दिया
हम अपने ही घर में हिस्सेदार हो गए।
किसी दिन गुबार बनके उठेगा मेरी आंखों का लहू
अभी रगों में दौड़ रहा है शराफत के लिए।
शिक्षक दिवस
सहज हरदीप की अपनी रवानी हो न पाती
तुम्हारे बिन जीवन की कहानी हो न पाती।
महज सब किस्मत की रेखा से उलझते
तुम्हारे बिन कोई और निशानी होना पाती!
जरूरत तो बेशुमार होने की है। बीमार तो बहुत दिन से हैं इश्क में।
तुमसे तो वादे तक टूट गए अपने। हमसे तो हौसला भी नहीं टूटा अपना!
खुद का हाथ भी कभी हाथ पर नहीं रखता।
मैं शायरी में झूठे जज्बात नहीं रखता।
तुम हो मासूम ये बात मालूम है मुझे ।
इसलिए ही तो तुम्हारे कंधे पर कभी हाथ नहीं रखता।।
ये दुनिया है इसकी धार से थोड़ा अलग बैठों ।
इस मझधार में कोई इंतजार नहीं रखता।।
दीवार पर बने शाए तो बुरा लगता है।
इसलिए ही तो मैं घर में कोई चिराग नहीं रखता।।
कई बार देखूं तो कुछ असर होता है।
मैं चेहरे पे एक बार में नहीं मरता।। एतबार नही रखता
तुम्हारे बदन की बनावट ही कुछ ऐसी है।
तुम्हें देख लूँ तो कोई और नहीं जंंचता।।
अंधेरे कमरे में रोशनदान जैसे
आप लगतें हैं मेरे मेहमान जैसे.
मैं इस कुनबे को जब भी देखता हूँ
सब नज़र आते हैं मेरे खानदान जैसे।
बड़ी मुश्किल से मोहब्बत में ये मुकाम आता है।
तुम किसी और को भी देखो तो वह याद आता है।
मोहब्बत सख्त राहों में नहीं टिकती मेरे मालिक ,
ये एसी बात है जिसका कोई शिकवा नहीं होता।
समुंदर की तरफ दौड़ती नदियों ने यह कहा ,
मोहब्बत हो अगर दरमियाँ तो कुछ कड़वा नहीं होता।।
वक्त को नामंजूर सही मेरे ख्वाब का तरन्नुम
पर मैं यही एक गीत बार-बार गुुनगुनाऊंगा।
कितने वक्त तक पालने पड़ते हैं एक ख्वाब आंखों में? ✍️#prankeparinde
सच कहता हूं, झूठ नहीं है सूनी आंखों में ख्वाब का कोना ।
ये पत्र बता रहे हैं सबसे रात के बाद फिर दिन का होना ।।
ख्वाब को तामीर करते हुए रो दिए ,
हम अपने आप को जागीर करते हुए रो दिए।
वो इतना दूर चला गया मेरी बाहों से ,
कि हम उसको आवाज लगाते हुए रो दिए।
एक ही तो हुनर सीखा था हमने मोहब्बत में ,
सो उसकी याद आयी और हम हुए रो दिए।
सुकून का एक कतरा भी हमारे नाम नहीं आया |
तुम्हारी याद का मौसम हमारे कोई काम नहीं आया ||
मैंने घोल कर आंसू कुछ फीके किये मगर ,
ये जज्बात का फीकापन भी कोई काम नहीं आया ||
उलझ गई दर्द की कहानी खुद मुझसे ,
मेरा किरदार का सीधापन कोई काम नहीं आया ||
ले जाए जिसे जरूरत हो इस बेतुक की चीज को ,
ये दिल तो मेरे कभी कोई काम नहीं आया ||
तट पर पटक-पटक कर माथा
सागर खारे हो जाते हैं |
उड़ कर पंछी पिजरे से अपने
और भी प्यारे हो जाते हैं ||
सितम जदा है ख्वाब सारे
मैं उनकी तहे पलट रहा हूं
मैं अपने जख्मों की नई कहानी
पुराने जख्मों से कह रहा हूं
तुम मेरे इरादों से जान लो
कि मैं यहां पर नहीं रुकूंगा
तुम कितना चाहो लेकिन
मैं तुम्हारे आगे नहीं झुकूँगा
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