रविवार, 28 मई 2023

संसद




 लिखो हर आँख में सपनों की दुनिया 

बजे हर कान में जयघोष ध्वनियाँ  

तुम्हारी जीत का स्वर्णिम पल है अब तो 

उठो जागो यही कल है अब तो 

नहीं संकट का कोई वर है अब तो 

हमारे कल का नया घर है अब तो 


यहीं उम्मीद की कलियों पे फिर से बात होगी 

हर दीद में सुकून की फिर रात होगी 

हां उसी दर को ठिकाना मिल गया है 

हमारे संघर्ष को जमाना मिल गया है 


खेत की मेड़ों पर चलता हो जो कोई 

किसी बेचारगी में पलता हो जो कोई 

हर एक दीन के कंधे को बंधु मिल गया है 

हमारे मंथन को सिंधु मिल गया है 


ये ईंटों का नहीं त्यागो का भवन है 

ये सुभाषित भगत का बस चंद्र वन है 

इसी में पलके हम सब राम होंगे 

इसी में धन्य सारे काम होंगे 


देखो,  हर आँख में यही ख्वाब थे ना 

किसी ने तू बनाया पर सहज में आप थे ना

ये तुम्हारे पौरुष का ही तो फल है 

जो तुमने सोचा था वही तो कल है


जय हिंद जय भारत जय संसद







रविवार, 21 मई 2023

मौसम है हिज्र का तो बरसने दो आँसू ;

 


तू जो हो सामने तो पलकों को झपकने नहीं देता, 

साँसें पूछतीं हैं इशारों में मगर झूमने नहीं देता। 

हाँ देता हूँ धड़कनों को थोड़ी सी इजाजत 

फिर दिल को हौले से तेरा होने नहीं देता। 

मौसम है हिज्र का तो बरसने दो आँसू ; 

मैं आँखों को लबालब कभी होने नहीं देता। 

एक दिन मैंने देखा था तेरे हाथों में लहू ; 

तब से ही रगों में इसे दौड़ने नहीं देता।


इस बात पर हुई है जमानत मोहब्बत की;  

कि मैं जिंदगी भर रहूँगा अमानत मोहब्बत की।

तू रुठी है तो एक बार मनाने मोहब्बत जाए, 

मैं भी तो जरा देखूँ शयानत मोहब्बत की।


जख्म दर जख्म की मुझको कहानी होने दो।

प्यास का क्या है मुझको तो बस पानी होने दो।


पक्की मिट्टी से बने ईटों की कब्र में लोग 

ना जाने क्यों जिंदगी दफन कर रहे हैं?


स्त्रियां नदी की कोमल धाराएं जैसी होती हैं जो पुरुष के कठोर पत्थर जैसे मन पर।इतनी कोमलता से वार करती हैं कि पुरुष को पता ही नहीं चलता कि कब उसके बीच में एक प्रेम की धारा बहने का सही मार्ग बन गया?


एक छोटी आँख से रूह की दिवार तक।

आदमी मजदूर है मौत के दीदार तक।

जिंदगी के खराबे की मिशाल ये है की 

खुदखुशी में भी हमारे कभी खुशी नहीं रही


 अभी अभिशाप के बस शगुन हुए हैं

अभी दुर्दांत होनी है कहानी!

स्वार्थ की जिह्वा पर देखो, 

चुप है कई नितांत कहानी।

मानवीय मूल्यों को तुमने तोड़ करके 

जियो हो धर्म से मुंह मोड़ कर के।

भला क्या धर्म उसका साथ देगा 

जो जमाने भर को हरदम त्रास देगा?

 तुम्हें ना नर ना नारी में दिखा है।

ना फूलों भरी किसी क्यारी में दिखा है।

तुम्हें तो शोर करना है जहाँ में 

बस हर दम होड़ करना है जहाँ में।