लिखो हर आँख में सपनों की दुनिया
बजे हर कान में जयघोष ध्वनियाँ
तुम्हारी जीत का स्वर्णिम पल है अब तो
उठो जागो यही कल है अब तो
नहीं संकट का कोई वर है अब तो
हमारे कल का नया घर है अब तो
यहीं उम्मीद की कलियों पे फिर से बात होगी
हर दीद में सुकून की फिर रात होगी
हां उसी दर को ठिकाना मिल गया है
हमारे संघर्ष को जमाना मिल गया है
खेत की मेड़ों पर चलता हो जो कोई
किसी बेचारगी में पलता हो जो कोई
हर एक दीन के कंधे को बंधु मिल गया है
हमारे मंथन को सिंधु मिल गया है
ये ईंटों का नहीं त्यागो का भवन है
ये सुभाषित भगत का बस चंद्र वन है
इसी में पलके हम सब राम होंगे
इसी में धन्य सारे काम होंगे
देखो, हर आँख में यही ख्वाब थे ना
किसी ने तू बनाया पर सहज में आप थे ना
ये तुम्हारे पौरुष का ही तो फल है
जो तुमने सोचा था वही तो कल है
जय हिंद जय भारत जय संसद