मंगलवार, 23 जनवरी 2024

नेताजी सुभाष चंद्र बोस

 आज की तारीख बहुत ही विशेष है क्योंकि ये वो तारीख है जिसने भारत की अनंत अनंत कोटि 

आत्माओं की प्रार्थनाओं को सफल होने के बाद उन सभी हृदयों की संतुष्टि को महसूस करके देखा है 

उसने देखा है कि सपने साकार होते हैं उसने देखा है कि बलिदानों के भी आकर होते हैं उसने देखा 

है कि सत्य परेशान हो सकता है पर पराजित नहीं उसने देखा है भारत के नवउद्भाव का प्रथम तीर्थ 

उसने जन्मों जन्मों की फलित कहानी देखी है उसने भारत की जाग उठी जवानी देखी है 

 

अरुण गगन पर महाप्रगति का , अब फिर मंगल गान उठा।

करवट बदली अंगड़ाई ली , सोया हिंदुस्तान उठा। ।२

सौरभ से भर गई दिशाएं , अब धरती मुस्काती है।

कण-कण गाता गीत गगन की , सीमा अब दोहराती है।

मंगल गाना सुनाता सागर , गीत दिशाएं गाती है।

मुक्त पवन पर राष्ट्र पताका , लहर – लहर लहराती है।

तरुण रक्त फिर लगा खौलने , हृदयों में तूफान उठा। ।

अरुण गगन पर महाप्रगति का , अब फिर मंगल गान उठा। 

करवट बदली अंगड़ाई ली , सोया हिंदुस्तान उठा। ।२


आज 23 जनवरी है आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जन्म जयंती है 

नेताजी सुभाष चंद्र बोस जिन्होंने सच में इस देश को संबल दिया 

साहस दिया शौर्य और अनुशासन के संस्कार दिए 

उन्होंनेआजादी की लड़ाई के लिए आजाद हिंद फौज का गठन किया 

और देश की बिखरी  हुई जवानी  को एक ऐसे लक्ष्य की तरफ लगाया 

जिससे आने वाले वक्त और आने वाली पीढ़ी अपने आप को स्वतंत्रता के भाव से अलग न रख सके 

बल्कि उसे जी सके उसे महसूस कर सके 

इस देश की मिट्टी और हम सभी आज उनके इस कार्य के लिए 

उन्हें धन्यवाद व्यक्त करते है आभार व्यक्त करते  है और सम्मान व्यक्त करते  है 

जिसके वे  सहज पात्र हैं 


माना अहिंसा शब्द उत्तम था 

माना सत्याग्रह भी लड़ाई थी 

माना सभी वीर पूतों की बड़ी-बड़ी बडाई थी 

पर तलवारों पे गर्दन रखना

ये कहाँ का कब से न्याय हुआ 

नेताजी के आने से ही तो 

इस जवानी का सम्मान हुआ  


विवशता कब से ओढ़ ली हमने

कब पराजित हमारे भाव हुए 

राम कृष्ण से पहले तो 

क्रोधित परशुराम हुए 

 

देखो मेरे वीर जवानों 

अपने खून पर ये इल्जाम न आये  

माँ न कहे कि मेरे बेटे

वक्त पडा तो काम ना आए


इस धारा की धूली भी तो 

माथे का चंदन बन सकती है 

वीर सपूतों की शूली भी 

देश का बंदन बन सकती है 

अपना बढ़ता शौर्य शत्रु के 

हृदय का क्रंदन बन सकती है 

वीर सपूतों की राखे भी 

आंख का अंजन बन सकती हैं


जब-जब पड़ी जरूरत हमको 

माओं  ने अपना काम किया है 

देकर वीर सपूत हमको 

इस देश का ऊंचा नाम किया है 


अब यही शपथ है अपना भी कि 

देश के हम भी काम आएंगे 

भारत मां के जयकारा में 

अपने भी तो नाम आएंगे

सोमवार, 15 जनवरी 2024

15-01-2024

 अपनी किस्मत का पता है मुझे तुम अपनी क्यों खराब कर रहे हो। 

मैं पहले ही भूल चुका हूं। तुम्हें तुम मुझे क्यों याद कर रहे हो?


तीन पीढियों से ऊपर जिन्हें नाम नहीं पता, 

उनके अब्बू क्या करते थे काम नहीं पता। 

वो मंदिर को मस्जिद बात ही देंगे।

कितने बड़े जाहिल है वो जता ही देंगे। 


Rat le gayi din le gayi 

Ghis ke chirag mera  jinn le gayi

Need le gayi Ummid le gayi 

Jo bhi pada tha ghar me mere 

tu kooda samjh bin le gayi 

Ab tu dekr mere nahale pe dahle ja 

Baby tu pahle ja

Chhod mera hath tu thalle ja


तेरी उम्मीद का साया बहुत है। 

मैंनें इश्क में पाया बहुत है। 

ये बेबशी की रातें । ये दिलजली कहानी 

जिंदगी ने मुझे रुलाया बहुत है 

दो आंखें और बेमिसाल ख्वाब 

तेरी आरजू ने सताया बहुत है 

देके चंद बोसे की मेहरबानी 

इश्क को तूने हर बार ये जताया बहुत है।


गाँव की पगडंडी से स्कूल का रास्ता बहुत था 

हमें जिंदा रहने के लिए ये वास्ता बहुत था 

खेतों के हरे चेहरे पर पीले फूलों की कुमकुम 

खाने में कद्दू और खस्ता बहुत था 

मेले की पिपिहीरी में दोस्ती की सांसें गरीबी के बर्तन में जस्ता बहुत था

 पापा की जेब में बस खाली कहानी

 उम्मीदों को ढ़ोने का बस्ता बहुत था

 शाम की हर रोटी में महँगाई की अकडन 

सुबह में चाय का नाश्ता बहुत था 

 जिंदगी में हर तरफ थी बस उलझने ही उलझने  

मगर मैं फिर भी हँसता बहुत था।


Tujhi se aaya tha hausala dilon me 

Ab mai tujhi pe kurban ho raha hun 

Jeet pe to tha sath jamane ka 

Magar Har kr bas akeli jaan ro raha hun


Hamare sapne hamari ummid ke chirag ho Tum 

Koi Kuchhh bhi kahe magar aag ho tum

Hamne tumhare ragon ka ubal dekha h

Hamne jab dekha tumhara kamal dekha h


जगमग रहे ज़माना अपना

जगमग अपनी फिज़ा रहे 

जगमग रहे रात का सपना

जगमग हर एक दिया रहे

जगमग रहे हर राह की मंजिल 

जगमग उसपर विश्वास रहे 

जगमग निशां रहे पैरों की

जगमग अपनों का साथ रहे 

कभी अकेला पड़े जो कोई 

जगमग जगमग आश रहे 

भले अकेला हो दुनिया में 

पर श्री चरणों का दास रहे 


तुम्हारे हलक से खींच लाएंगे गुरुर तुम्हारा तुम जानते नहीं हो सुरूर हमारा।




सहज हो तेरा निशा और जिंदगी बस खूब नजर आए। 
मैं जब भी नाम लूँ तेरा मुझे बस तू नजर आए।
फ़िज़ा की रँगतों में भी शामिल हो एक रंग तुम्हारा 
मैं जब भी आँख खोलू तो मुझे बस तू नजर आए।


मन की भावों को जिसने शब्दों का वरदान दिया हो 
ज्ञान के निर्गुण दीप को जिसने सगुणता का सम्मान दिया हो, 
जिसने दिया हो धमनियों में देश प्रेम का अतुलित बंधन 
और हमारी सोच में जलती बनकर विचारों का ईंधन ; 

हाँ हम उस माता के लाल हैं जिसके माथे पर एक बिंदी है। 
गर्व से कहो, हमारी भाषा प्यारी-प्यारी हिंदी है।

विश्व हिंदी दिवस की शुभकामनाएँ।

सितम की आँख में तो सितारा हो नहीं सकता ;
जहाँ पर प्रेम हो वहाँ किनारा हो नहीं सकता।
दिलों की डोर है जो हम सभी को साथ रखती है ; 
यहाँ पर सिर्फ हमारा और तुम्हारा हो नहीं सकता ।।

सहज हरदीप की अपनी रवानी हो न पाती 
तुम्हारे बिन जीवन की कहानी हो न पाती।
महज सब किस्मत की रेखा से उलझते 
तुम्हारे बिन कोई और निशानी होना पाती!

शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं 


कौन देगा मेरे हौसलों की गवाही कौन मेरे साथ इम्तिहान में होगा तुम जिसकी धौंस से डर रहे हो उसका तीर मेरी कमान में होगा।


तने दिन भी नमक खाकर गद्दारी नहीं गई और एक हम हैं कि हमारे खून से यारी नहीं गई।


गर्म हुए दूध को जैसे मलाई बॉंधती है, बहन उस तरह ही भाई की कलाई बाँधती है।


जब कोई तुमसे कहे कि नहीं आएगा और तुम्हें सुनाई दे की नहीं .. आएगा !! तो समझ लेना मोहब्बत हो गई।दौलतों पर एतबार हो गया जब से मोहब्बत बेवफा निकल गई।


हां भाग्य का विधि मानते हैं पर कर्म करना जानते हैं।

अपने पौरुष की शिला पर जब नया प्रण ठानते हैं।

सहस्त्र वर्षों तक हमीने ज्ञान का उपदेश भेजा।

बुझ चुके जीवन में हमने ज्योति का संदेश भेजा।


अब हर एक चिन्मय अपना ही नया आनन दिखेगा

सोच की बंजर जमीं पर चहू ओर कानन दिखेगा


नेहरू हुए गुलजार कभी तो कभी शास्त्री भी गुलजार हुए। इंदिरा जब जब मोर बनी तो चरणों में उनके वार हुए 

राजीव हुआ जब देश हमारा 

V P बढ़ गया सबका यारा चंद्रशेखर पीवी अटल रहे जब एचडी देवा गुजराल रहे तब 

तब से अटल है देश हमारा मनमोहन मोदी का प्यारा

गगन मे लहरता है भगवा हमारा ।

 गगन मे लहरता है भगवा हमारा ।

घिरे घोर घन दासताँ के भयंकर

गवाँ बैठे सर्वस्व आपस में लडकर

बुझे दीप घर-घर हुआ शून्य अंबर

निराशा निशा ने जो डेरा जमाया

ये जयचंद के द्रोह का दुष्ट फल है

जो अब तक अंधेरा सबेरा न आया

मगर घोर तम मे पराजय के गम में विजय की विभा ले

अंधेरे गगन में उषा के वसन दुष्मनो के नयन में

चमकता रहा पूज्य भगवा हमारा॥१॥


भगवा है पद्मिनी के जौहर की ज्वाला

मिटाती अमावस लुटाती उजाला

नया एक इतिहास क्या रच न डाला

चिता एक जलने हजारों खडी थी

पुरुष तो मिटे नारियाँ सब हवन की

समिध बन ननल के पगों पर चढी थी

मगर जौहरों में घिरे कोहरो में

धुएँ के घनो में कि बलि के क्षणों में

धधकता रहा पूज्य भगवा हमारा ॥२॥


मिटे देवाता मिट गए शुभ्र मंदिर

लुटी देवियाँ लुट गए सब नगर घर

स्वयं फूट की अग्नि में घर जला कर

पुरस्कार हाथों में लोंहे की कडियाँ

कपूतों की माता खडी आज भी है

भरें अपनी आंखो में आंसू की लडियाँ

मगर दासताँ के भयानक भँवर में पराजय समर में

अखीरी क्षणों तक शुभाशा बंधाता कि इच्छा जगाता

कि सब कुछ लुटाकर ही सब कुछ दिलाने

बुलाता रहा प्राण भगवा हमारा॥३॥


कभी थे अकेले हुए आज इतने

नही तब डरे तो भला अब डरेंगे

विरोधों के सागर में चट्टान है हम

जो टकराएंगे मौत अपनी मरेंगे

लिया हाथ में ध्वज कभी न झुकेगा

कदम बढ रहा है कभी न रुकेगा

न सूरज के सम्मुख अंधेरा टिकेगा

निडर है सभी हम अमर है सभी हम

के सर पर हमारे वरदहस्त करता

गगन में लहरता है भगवा हमारा॥४॥


"बड़ा हसीन है, उनकी जुबान का जादू

लगाकर आग, बहारों की बात करते हैं!

जिन्होंने रात में बेखौफ बस्तियां लूटीं...

वही नसीब के मारों की बात करते हैं।"




कभी रुक गए कभी चल दिए

कभी चलते चलते भटक गए

यूँही उम्र सारी गुज़र गई

यूँही ज़िन्दगी के सितम सहे


कभी नींद में कभी होश में

तू जहाँ मिला तुझे देख कर

न नज़र मिली न ज़ुबान हिली

यूँही सर झुका के गुज़र गए


कभी ज़ुल्फ़ पर कभी चश्म पर

कभी तेरे हसीं वजूद पर

जो पसंद थे मेरी किताब में

वो शेर सारे बिखर गए


मुझे याद है कभी एक थे

मगर आज हम हैं जुदा जुदा

वो जुदा हुए तो संवर गए

हम जुदा हुवे तो बिखर गए


कभी अर्श पर कभी फर्श पर

कभी उन के दर कभी दर -बदर

ग़म -ए -आशीकी तेरा शुक्रिया

हम कहाँ कहाँ से गुज़र गए


-परवीन शाकिर


सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं

स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं

बँधा हूँ, स्वप्न हूँ, लघु वृत हूँ मैं

नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं

समाना चाहता, जो बीन उर में

विकल उस शून्य की झंकार हूँ मैं

भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में

सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं

न देंखे विश्व, पर मुझको घृणा से

मनुज हूँ, सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं

पुजारिन, धुलि से मुझको उठा ले

तुम्हारे देवता का हार हूँ मैं