सोमवार, 15 जनवरी 2024

गगन मे लहरता है भगवा हमारा ।

 गगन मे लहरता है भगवा हमारा ।

घिरे घोर घन दासताँ के भयंकर

गवाँ बैठे सर्वस्व आपस में लडकर

बुझे दीप घर-घर हुआ शून्य अंबर

निराशा निशा ने जो डेरा जमाया

ये जयचंद के द्रोह का दुष्ट फल है

जो अब तक अंधेरा सबेरा न आया

मगर घोर तम मे पराजय के गम में विजय की विभा ले

अंधेरे गगन में उषा के वसन दुष्मनो के नयन में

चमकता रहा पूज्य भगवा हमारा॥१॥


भगवा है पद्मिनी के जौहर की ज्वाला

मिटाती अमावस लुटाती उजाला

नया एक इतिहास क्या रच न डाला

चिता एक जलने हजारों खडी थी

पुरुष तो मिटे नारियाँ सब हवन की

समिध बन ननल के पगों पर चढी थी

मगर जौहरों में घिरे कोहरो में

धुएँ के घनो में कि बलि के क्षणों में

धधकता रहा पूज्य भगवा हमारा ॥२॥


मिटे देवाता मिट गए शुभ्र मंदिर

लुटी देवियाँ लुट गए सब नगर घर

स्वयं फूट की अग्नि में घर जला कर

पुरस्कार हाथों में लोंहे की कडियाँ

कपूतों की माता खडी आज भी है

भरें अपनी आंखो में आंसू की लडियाँ

मगर दासताँ के भयानक भँवर में पराजय समर में

अखीरी क्षणों तक शुभाशा बंधाता कि इच्छा जगाता

कि सब कुछ लुटाकर ही सब कुछ दिलाने

बुलाता रहा प्राण भगवा हमारा॥३॥


कभी थे अकेले हुए आज इतने

नही तब डरे तो भला अब डरेंगे

विरोधों के सागर में चट्टान है हम

जो टकराएंगे मौत अपनी मरेंगे

लिया हाथ में ध्वज कभी न झुकेगा

कदम बढ रहा है कभी न रुकेगा

न सूरज के सम्मुख अंधेरा टिकेगा

निडर है सभी हम अमर है सभी हम

के सर पर हमारे वरदहस्त करता

गगन में लहरता है भगवा हमारा॥४॥


"बड़ा हसीन है, उनकी जुबान का जादू

लगाकर आग, बहारों की बात करते हैं!

जिन्होंने रात में बेखौफ बस्तियां लूटीं...

वही नसीब के मारों की बात करते हैं।"




कभी रुक गए कभी चल दिए

कभी चलते चलते भटक गए

यूँही उम्र सारी गुज़र गई

यूँही ज़िन्दगी के सितम सहे


कभी नींद में कभी होश में

तू जहाँ मिला तुझे देख कर

न नज़र मिली न ज़ुबान हिली

यूँही सर झुका के गुज़र गए


कभी ज़ुल्फ़ पर कभी चश्म पर

कभी तेरे हसीं वजूद पर

जो पसंद थे मेरी किताब में

वो शेर सारे बिखर गए


मुझे याद है कभी एक थे

मगर आज हम हैं जुदा जुदा

वो जुदा हुए तो संवर गए

हम जुदा हुवे तो बिखर गए


कभी अर्श पर कभी फर्श पर

कभी उन के दर कभी दर -बदर

ग़म -ए -आशीकी तेरा शुक्रिया

हम कहाँ कहाँ से गुज़र गए


-परवीन शाकिर


सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं

स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं

बँधा हूँ, स्वप्न हूँ, लघु वृत हूँ मैं

नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं

समाना चाहता, जो बीन उर में

विकल उस शून्य की झंकार हूँ मैं

भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में

सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं

न देंखे विश्व, पर मुझको घृणा से

मनुज हूँ, सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं

पुजारिन, धुलि से मुझको उठा ले

तुम्हारे देवता का हार हूँ मैं

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