सर्वप्रथम मै अपनी बातें प्रारंभ करूँ उससे पहले यहाँ पर उपस्थित आप सभी महानुभावों को केरियर पॉइंट यूनिवर्सिटी की तरफ से नमन करता हूँ प्रणाम करता हूँ और स्वागत करता हूँ
और विशेष रूप से यहाँ पर उपस्थित हमारे मुख्य अतिथि .... जो की आये हुए सभी कवियों का मार्गदर्शन और अंकन करेंगें मैं उनका स्वागत और तहेदिल से शुक्रिया अता करता कि वो अपनी सफल उपस्थिति दर्ज किए हैं ,
आप सब के सहज और प्रशन्न चेहरों को देखकर ये अनुमान लगाया जा सकता है कि आज भी काव्य की उपयोगिता उसी प्रकार हैं जैसे बीते हुए वर्षों में रही है ,
आप सब ने एक सुभाषितानि सुनी होगी
"काव्य शास्त्र विनोदेन, कालो गच्छति धीमताम्।
काव्य या कहें साहित्य हमेशा से बुद्धिमत्ता का प्रतीक रहा है
तो आइए हम सब अपने मन को आज काव्य से मनोरंजित करते हैं औऱ इस महफ़िल को याद ग़ार बनाते हैं
1:- नजारे नज़र के भरम भूल बैठे
किनारें समुंदर के ख़म भूल बैठे
आप सबने दिखाया है प्यार इस कदर
हम इस जमाने के ग़म भूल बैठे
2:- माहौल खुशगवार फिर एक बार हो गया
गुलशन तुम्हारे आते ही गुलजार हो गया।
इससे हसीन दिन भी कोई होगा और क्या
मुद्दत के बाद यार
का दीदार हो गया
3:- वो दिन गए कि मोहब्बत थी जान की बाज़ी
किसी से अब कोई बिछड़े तो मर नहीं जाता
- वसीम बरेलवी
4:- अंधेरा मांगने आया था रौशनी की भीक
हम अपना घर न जलाते तो और क्या करते
- नज़ीर बनारसी
5:- खुदा की नेहमतों को जैसे गिनाया नहीं जाता
मोहब्बत कैसे हो जाती है? समझाया नहीं जाता
तुम्हारी देखकर सूरत किसी का दिन निकलता है
नहीं मिलते हो तुम तो रात का साया नहीं जाता
दिखाए किस तरह हम आपको दिल में फंसा कांटा
कुछ ऐसे दर्द हैं साथी जिन्हें बांटा नहीं जाता .
6:-किस कदर शामे मेरी तूने चूड़ियों से बांट दी
किस कदर ये रोशनी
तूने डेवढ़ीयों पे बांट दी
किस कदर मखमलों का काम तूने सस्ता किया है
किस कदर ये ख्वाब देकर जहन को जिंदा किया है
7:-आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा
पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उसने मुझे छू कर नहीं देखा
8:-जिम्मेदारीयां और भी होतीं हैं सूरज की
सिर्फ उजाला तो बर्क भी फैला देता है
जैसे पर्वत के शिखरों पर फ़ैली
सूरज की जयमाल रहे
जैसे सरिता में बहती
हर जीवन की रसधार रहे
जैसे फूलों के उपवन में खिलता
प्यारा सा एक गुलाब रहे
वैसे ही मन-जीवन में सबके
आपके प्रति सम्मान रहे
9:-मच्छरदानी तो बाद में इजात हुई
पहले तो मैं माँ का आँचल ओढ़ा करता था
माँ को फिकर इतनी हमारी होती थी
कि, घर से बाहर निकलकर भी निवाला होता था
बिन चप्पल के बाहर चला जाऊं तो
माँ के पैरों में भी छाला होता था
दूर उसके आँचल से बैठकर सोचता हूँ
वो शाया तो कितना अच्छा होता था
10:-हर दुआ कुबूल हो जरूरी तो नहीं
हर शाम की सहर हो जरूरी तो नहीं
मेरे दिल में जो था कल वो यादों का गुबार
आज वो तूफ़ां में शुमार हो जरूरी तो नहीं
11:-रोना-धोना सिर्फ़ दिखावा होता है
कौन मिरे जाने से तन्हा होता है
उसकी टीस नहीं जाती है सारी उमर
पहला धोका पहला धोका होता है
12:-इश्क़ गुनाह है या इबादत ये इशारा समझूँ
तू आँख खोलें तो कितना है ख़ासारा समझूँ
यही शर्त है वस्ल की तो चल मंजूर है मुझे
मैं भी कौन सा इस जहाँ में उम्र भर के लिए आया हूँ
13:-रात भी नींद भी कहानी भी
हाए क्या चीज़ है जवानी भी
14:-तबस्सुम है वो होंटों पर जो दिल का काम कर जाए
उन्हें इस की नहीं परवा कोई मरता है मर जाए
क़दम इंसाँ का राह-ए-दहर में थर्रा ही जाता है
चले कितना ही कोई बच के ठोकर खा ही जाता है
15:-फड़फड़ाकर पत्तियों सी आम नहीं होतीं
जड़ें किसी मौसम की ग़ुलाम नहीं होती
16:-उसने कब चांद तारे मांगे मुझसे ,मै तो जो हथेली पे रख देता वो बादल ही
बहोत था
मुझे नहला कर मां ने
कभी गमछा नहीं ढूँढा ,
मुझे सुखाने को उसका आंचल बहोत था
17:-मोहब्बत में
जवानी पानी करते हैं
जो लोग बड़े होकर नादानी करते हैं
देकर नए पौधों की जड़ों
में पानी
कुछ लोग ही तो इस
दुनिया पे मेहरबानी करते हैं
18:-इन नन्हीं
-नन्ही कलियों को
ना तोड़ो अपनी डालों से
कल को यही खिलकर पूरे
गुलशन-गुलशन हो
जायेंगे
19:- बिछड़ के तुझ
से कुछ जाना अगर तो इस क़दर जाना
वो मिट्टी हूं जिसे दरिया किनारे
छोड़ देता है
मोहब्बत में ज़रा सी
बेवफ़ाई तो ज़रूरी है
वही अच्छा भी लगता है
जो वादे तोड़ देता है
20:-तुम क्या जानो
अपने आप से कितना मैं शर्मिंदा हूँ
छूट गया है साथ
तुम्हारा और अभी तक ज़िंदा हूँ
- साग़र आज़मी
21:-बेचैन इस क़दर
था कि सोया न रात भर
पलकों से लिख रहा था
तिरा नाम चाँद पर
22:-बढ़ते चले गए जो वो मंज़िल को पा गए
मैं पत्थरों से पाँव
बचाने में रह गया
23:-सबr कर लेना
लम्हे ज़ाया मत करना
ग़लत जगह पर जज़्बे
ज़ाया मत करना
इश्क़ तो नीयत की
सच्चाई देखता है
दिल न झुके तो सज़दे
ज़ाया मत करना
‘ जुल्फ़े पलट
पलट के इशारा न करो
थोड़ी बहुत तो आशिकी हम
भी जानते हैं ,
24:-गमों की
धूप है, आहों
का मौसम सर्द
रक्खा है,
नज़र में
मैंने आँसू, दिल में उसका दर्द रक्खा है,
जिसे दी जिंदगी,मुझको वो तिल-तिल
मारता क्यों है?
वो क़ातिल
है मेरा, मैंने
जिसे हमदर्द रक्खा है..!!
25:-इश्क़ में
जुदाई तो होनी ही थी
एक न एक दिन तो विदाई
होनी ही थी
मैं कब तक रखता तुझे
धड़कनों में छुपा के
एक न एक दिन तो दुनिया
से रिहाई होनी ही थी
26:-विद्वत्त्वं च
नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन ।
स्वदेशे पूज्यते राजा
विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ॥
27:-इतने क्रूर
वीभत्स लम्हों का खेल नही देखा जाता
अब मुझसे इन हैवानों
का मनमैल नही देखा जाता
इतनी गहरी करुणा ही
क्या जिसमें मानवता ही डूब मरे
मौन की धुन पर सारा
जमाना साथ समय के झूल पड़े
28:-तलब की राह
में पाने से पहले खोना पड़ता है ,
बड़े सौदे नजर में हों
तो छोटा होना पड़ता है ,,
जुबां देती है जो आँशु
तुम्हारी बेज़ुबानी को
उसी आँशु को फिर आँख
से बाहर होना पड़ता है ,
29:- मिरे दिल की राख कुरेद मत इसे मुस्कुरा के
हवा न दे
ये चराग़ फिर भी चराग़
है कहीं तेरा हाथ जला न दे
-बशीर बद्र
नजाकत ले के आँखों में, वो उनका देखना तौबा,
या खुदा ! हम उन्हें
देखें, की उनका देखना
देखें ।
-अज्ञात
30:- ये दुनिया नही
तुम्हारी है ,
ये देश नही तुम्हारा
है ,,
ऐ साँसों में गन्ध
फैलाने वालों ,
तुम्हारे बाद भी कोई
आने वाला है ,,
वर्षों का इतिहास यही
है
समझोगे तो बात यही है
हर आने वाले कल के
पीछे
आज का बीता ख़्वाब सही
है
31:- आज तक उस की
मोहब्बत का नशा तारी है
फूल बाक़ी नहीं
ख़ुश्बू का सफ़र जारी है
ये समझ के
माना है सच तुम्हारी बातों को
इतने ख़ूब-सूरत लब झूट
कैसे बोलेंगे
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