सोमवार, 22 सितंबर 2025

श्री विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम

 

  • निशुम्भ शुम्भ गर्जनी,
    प्रचण्ड मुण्ड खण्डिनी ।
    बनेरणे प्रकाशिनी,
    भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

    त्रिशूल मुण्ड धारिणी,
    धरा विघात हारिणी ।
    गृहे-गृहे निवासिनी,
    भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

    दरिद्र दुःख हारिणी,
    सदा विभूति कारिणी ।
    वियोग शोक हारिणी,
    भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

    लसत्सुलोल लोचनं,
    लतासनं वरप्रदं ।
    कपाल-शूल धारिणी,
    भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

    कराब्जदानदाधरां,
    शिवाशिवां प्रदायिनी ।
    वरा-वराननां शुभां,
    भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

    कपीन्द्न जामिनीप्रदां,
    त्रिधा स्वरूप धारिणी ।
    जले-थले निवासिनी,
    भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

    विशिष्ट शिष्ट कारिणी,
    विशाल रूप धारिणी ।
    महोदरे विलासिनी,
    भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

    पुंरदरादि सेवितां,
    पुरादिवंशखण्डितम्‌ ।
    विशुद्ध बुद्धिकारिणीं,
    भजामि विन्ध्यवासिनीं ॥

शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

मुक्ति करता हूँ मैं जाना चाहो अगर पर सभी का बदलता समय है प्रिये….२

 मुक्ति करता हूँ मैं जाना चाहो अगर 

पर सभी का बदलता समय है प्रिये….२

अब बदलना तुम्हारा तो है लाज़मी 

लूट चुका है हमारा सहारा अभी 

पर श्रवण रन्ध को खोल कर सुन लो ये 

सच परेशान है, है ना हारा अभी 

देह मानव का धारण किया जिसने भी 

उसका कष्टों से लड़ना तो तय है प्रिये 

मुक्त करता हूँ मैं जाना चाहो अगर…….


मेरा दुख वो नहीं प्रेम में जो मिले 

मुफ़लिसी का हूँ मैं तो सताया हुआ 

राबता करना लोगों से मुश्किल है अब 

मैं तो इंशान हूँ मात खाया हुआ 

कुछ भी सोचा हुआ कर नहीं पा रहा 

एस जीवन में आया प्रलय है प्रिये 

मुक्ति करता हूँ मैं जाना चाहो अगर 

पर सभी का बदलता समय है प्रिये….२

Happy friendship Day

 लग जाए ज़ख्म पे पट्टी तो उसका घाव नहीं होता

जहाँ हो प्यार की डोरी वहाँ मोल भाव नहीं होता 
हाँ माना खून का रिश्ता नहीं है हम सभी में पर
ना होता दिल से कोई रिश्ता तो ये दोस्ती का चुनाव नहीं होता






शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ ✍️ 👣 🫵

 परख नली से पहले परखा 

जीवन के सूखे में बरखा 

दुख को काट 

सुख को चरखा 

ऐसा जीवन योग रहा है 

शिक्षक होना संयोग रहा है



वर्तमान की भीड़ मिली तो 

हमनें भविष्य के नीड़ बनाए 

मन ने जब-जब विचलन माँगा 

तो,हमनें कस के जंजीर बनाए 

अंधकार की हर दुविधा में 

दीपक होना योग रहा है 

शिक्षक होना संयोग रहा है


वर्तमान की भीड़ मिली तो 

हमनें भविष्य के नीड़ बनाए 

मन ने जब जब विचलन माँगा 

तो,हमनें कस के जंजीर बनाए 

अंधकार की हर दुविधा में 

दीपक होना योग रहा है 

शिक्षक होना संयोग रहा है


जिन्होंने सिर्फ़ कामना की थी 

हमने उनको लक्ष्य दिया है 

दुःख के भाले चले कहीं तो 

हमनें अपना वक्ष दिया है 

जितने उदाहरण माँगे दुनिया ने 

हमनें एक एक समक्ष दिया है 

युग की हर एक कसौटी पर 

कस जाना ही योग रहा है 

शिक्षक होना संयोग रहा है


रात हुई थी कब अपनी 

कब उजाले अपने थे 

जीवन में पीछे सोचा तो 

कितने सपने अपने थे 

दिन से रात,रात से दिन तक 

घुल जाना ही योग रहा है 

शिक्षक होना संयोग रहा है