शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

मुक्ति करता हूँ मैं जाना चाहो अगर पर सभी का बदलता समय है प्रिये….२

 मुक्ति करता हूँ मैं जाना चाहो अगर 

पर सभी का बदलता समय है प्रिये….२

अब बदलना तुम्हारा तो है लाज़मी 

लूट चुका है हमारा सहारा अभी 

पर श्रवण रन्ध को खोल कर सुन लो ये 

सच परेशान है, है ना हारा अभी 

देह मानव का धारण किया जिसने भी 

उसका कष्टों से लड़ना तो तय है प्रिये 

मुक्त करता हूँ मैं जाना चाहो अगर…….


मेरा दुख वो नहीं प्रेम में जो मिले 

मुफ़लिसी का हूँ मैं तो सताया हुआ 

राबता करना लोगों से मुश्किल है अब 

मैं तो इंशान हूँ मात खाया हुआ 

कुछ भी सोचा हुआ कर नहीं पा रहा 

एस जीवन में आया प्रलय है प्रिये 

मुक्ति करता हूँ मैं जाना चाहो अगर 

पर सभी का बदलता समय है प्रिये….२

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें