रविवार, 26 अप्रैल 2020

kavitayen jiname sach bolta hai .

कविताएँ जिनमें सच बोलता है  ... 
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आज की व्याप्त व्यवस्था में अवसाद और निराशा सहज ही उत्पन्न हो सकती हैं , पर इस विपरीत परिस्थिति में भी

 हमें मानवीय गुणों को नहीं भूलना चाहिए ,

  जैसा मैथलीशरण गुप्त जी कहते हैं। .....

             नर हो, न निराश करो मन को
             कुछ काम करो, कुछ काम करो
                   संभलो कि सुयोग न जाय चला
         कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
             समझो जग को न निरा सपना
                    पथ आप प्रशस्त करो अपना

 और बची बातों को प्रकृति/परमेश्वर पे छोड़ दो। ... 


        "  करें कब क्या, इसे बस राम जानें,

          वही अपने अलौकिक काम जानें।   "

   लेकिन अब जब दुबारा से सब ठीक हो जाये तो प्रकृति का मानवीय अधिकार से अधिक हनन करने से पहले जरूर एक बार सोचें , सब्जी लेते समय मिलने वाली पॉलीथिन को देखें क्या आप इसे स्वयं से बंद करेंगे या खुद ऐसे समय का इंतजार करेंगे जिससे आप का खुद उसमे बंद होने की नौबत आ जाए , 

         प्रकृति रही दुर्जेय, पराजित, हम सब थे भूले मद में,
          भोले थे, हाँ तिरते केवल सब, विलासिता के नद में।   जयशंकर प्रसाद जी 

जाग्रित रहें और पढ़ें मेरी लिखी हुई कुछ कविता .... 

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(1 ) जीवन की समृद्धि का अधिकार उसी को होता है ,
जो सच के साथ खड़ा होकर झूठ का तिरस्कार करता है।















              (2 )

बुझे नैनो की ज्योति सम 
मुझमें भी कुछ व्याप्त रहा है। 
खोल कपाट दिलों को देखा 
माया का अभिशाप रहा है। 

दुर्जन दुर्गुण सब प्रिय हैं अपने 
जिनसे लिप्त स्वार्थ रहा है। 
मोह कि चलनी से चलने को 
बचा खुचा कुछ पाप रहा है । 

गजब की दुनिया है भ्राता ये 
अन्याय, न्याय के साथ होता है ।
सच की डगर तकने वालों का 
मूर्खों में बस नाम होता है। 

सत्य की वाणी सब वेद पुराण 
ये गूँगे की एक कहावत है। 
सच में दिखता है वही हमें 
जो जीवन, हमें दिखावत है।












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                           (3 )


मूल के हैं तूल गड़े 
ये शब्द हैं बड़े-बड़े 
पर हम विचार से क्यों 
दूर हैं खड़े-पड़े 

इन सपनों की राह में 
रात्रि के उद्गार में 
कौन सच को सोचता है 
झूठ की राह रोकता है ,

सब अपने ही स्वार्थ में 
माया के सँसार में 
भाग्य की इस बीन को 
माथे की संगीन को 
इधर-उधर हैं सोचते 
खुद की राह रोकते । 

नम हुई आँख भी 
जख्मी होठों के बाद भी 
स्वार्थ के इस मंत्र को 
भलीभांति बोलते 
झूठ की इस राह को 
कोई नहीं रोकते .....


               धन्यवाद 💖💖🙋🙋💧
                    अगर आपको ये कविता पसंद आयी हो तो इसे और लोगों तक पहुचायें , आपका दोस्त आपका भाई प्राण mishra ( pran ke parinde...
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मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

A squirrel in courtyard

A squirrel in courtyard  






QUOTES 4:- दूसरों को अपशब्द कहने वाला पहले मन में खुद को वो शब्द बोलता हैं  ! 



 
          एक गिलहरी ऑंगन में ....
                          कुछ दाना चुनने आती है ,
         चंचलता के दीप जलाकर आँखों में ले आती है ,,

        क्या इरादा क्या रंजिश क्या मिठास है दिल में 
           जो हर रोज सुबह होते ही दिखाने चली आती है ,

         मैंने भी सोच लिया है अब ये ,उसको खूब चिढ़ाऊँगा 
            दाना रखके पास में अपने दूर नहीं मैं जाऊँगा  ,

         किया इरादा बन्दिश भी की पर कुछ हि देर में पिघल गया 
             जब उसने अपने दोनों पैरों को हाथ बनाकर जोड़ लिया, 

          सच में बहुत प्यारी है हम सब की बहुत दुलारी है 
              शादी शुदा जिंदगी है फिर भी लगती एकदम कुवाँरी है ,

          कूलर की नरम घांस से अच्छा बिस्तर बना रखा है
                 जिसकी बनावट देखकर लगता भगवान ने क्यूँ  मुझको                                                     इन्शान बना रखा है  ,

          अगर मै भी होता उसके जैसा खूब मस्तियाँ करता  
                  सुबह-सुबह आँगन में आकर खूब हठखेलियाँ करता ,


                     प्राण MISHRA की कलम से।

अनमोल वचन :- सेवा ही किसी धर्म के सजीव होने के लक्षण हैं  -मुंशी                प्रेमचंद्र 








गिलहरी पर लिखी अमृत श्रीवास्तव जी की कविता --
रखे हिमालय को कंधे पर,
चली सूर्य की ओर गिलहरी।
कहां खतम है आसमान का,
ढूंढ़ रही है छोर गिलहरी।

अंबर से वह देख रही है,
धरती की ओझल हरियाली।
इसी बात पर जोर-जोर से,
मचा रही है शोर गिलहरी।
श्वांस और उच्छवांस कठिन है,
धरती पर अब जीवन भारी।
यही सोचकर आज हो रही,
है उदास घनघोर गिलहरी।

कण-कण दूषित आसमान का,
मिट्टी की रग-रग जहरीली,
यही बताने आज रही है,
सबको ही झखझोर गिलहरी।
आंखों में आंसू आते हैं,
दशा देखकर भारत मां की,
कल क्या होगा सोच-सोच कर,
होती भाव-विभोर गिलहरी।


Old age home

👴वृध्दाश्रम.......
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QUOTE 3:-पढ़े लिखें होने से अच्छा है समझदार हो जाना
एक बार गौर से देखिए, इस शब्द को,  फिर अपने जहन के अंध गलियारों से सोच की जीवंत ज्योति के प्रकाश तले पढ़िए, क्या कहना चाहता है ये,










               जहाँ तक मेरी वैचारिक शक्ति है, यह वृध्दाश्रम-वृध्द के आश्रम का बोध कराता है,   जब किसी इंसानी शरीर का पौरुष जीवन की ऊँच - नीच में दौड़ाते दौड़ाते, हड्डियों को कड़क और चमड़े को साड़ी के चुनमुट में बदल देता है, कहने को तो पूरा अनुभव साथ होता है परंतु दिखाने को -एक असहाय जिंदगी के बोझ को ना उठा  सकने वाले हाथ और कंधे  के सिवा कुछ भी नहीं होता,,

                         दूसरा शब्द आश्रम, नाम सुनते ही न जाने क्यों एक निमित्त अनुशासन के बादल सोच के आसमान में मडराने लगते हैं, यकीन नहीं होता तो एक बार सोच के देखिए, कल्पनाओ के मझधार में जाईये महसूस होगा ,   आपको की   हाँ   ये तो सच है,
                सोचिए ऐशी परिस्थिति  में हमें कैसा लग रहा है जब कि हम केवल सोच से उस चौखट तक गए हैं, पर सोचिए उनके बारे में जो अपने जीवन का वो समय वहाँ काट रहे है , जिसमें और किसी का तो छोड़ो खुद की जिंदगी भी साथ देने को तैयार नही होती ,  ऐसी स्थिति में वह आदमी कैसे जिंदगी जीता है कैसे अपने बीते जीवन के सुखद सपनों को कांटे चुभें आंखों में कैसे उतारता  है यह तो वही बता सकता है,
              यह अविकल्पी जिंदगी की दुर्दशा भरी दशा है , जब विकल्प हो सकते थे तब तो वो  इस जिंदगी को इस सोच पे बिता दिया कि उसके बच्चे काबिल होंगे और ये सच हो गया उनके  बच्चे इतने काबिल हो गए कि वे इनको इतना बड़ा तौफा दिए जो की हाथों से उठ नही सकता इसलिए खुद ही इनको यहाँ पहुँचा गए ,  ज्यादा आगे बढ़ने के चक्कर में कई बार हम खुद से ही पीछे छूट जातें हैं .........
      और हाँ  पढ़े लिखें होने से अच्छा है समझदार हो जाना
           प्राण mishra की कलम से...👴



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Family of five monkeys

🐒🐒पाँच बंदरों का परिवार …



Quote 2 - इंतजार करने वालों के लम्हे बड़े होते हैं !


आज सुबह देरी से उठा तो सारी नित्यक्रियाये करने में 10 बज गये ,शीतलहर की छुट्टी चल रही थी
     तो कहीं आने जाने का काम नहीं आज पूरे दिन कमरे पे ही रहना था ।

वही पुरानी समय सारणी को अपनाते हुए ,सुबह की प्राथमिक क्रियाओं को करके ,भगवत गीता पढ़ने छत पे आ गया ।सीढ़ियों से छत पे आते समय, सीढ़ी के दरवाज़े के नीचे की जग़ह से कुछ सूर्य का प्रकाश जैसे नये जन्मे बच्चे की तरह लालिमा लिए मानो मेरे लिए ही आ रहा था और आकर कहता कि उठो इस आलस के सागर से, दुनिया बहुत आगे निकल गई ।उठो अँधेरों में सपने देखना बंद करो, ऐसी आशावान व भावपूर्ण रोशनी को देखकर मेरे चेहरे पे खुशी की लहर दौड़ पड़ी और मैं दरवाजा खोलकर छत पे आ गया ,

                      तो देखा सूरज पूरी तरह निकला हुआ। वह अपने प्रकाश से सारी जगह ऊर्जा का संचार कर रहा था, मैंने उसको दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया, और अपनी भगवत गीता देखी और बैठने की जगह ढूँढने लगा ,जहाँ मैं और मेरे विचार हो बस ।
                     मुझे बगल में रख्खी पत्थर की पटरी पर अपने बैठने का उचित स्थान मिल गया ।मैं गीता से उसके विचार कुछ ग्रहण करता उससे पहले ,  मेरी नज़र वहाँ पहले से उपस्थित बंदरों पे चली गई , ये पूरे एक परिवार थे । जिसमें तीन बच्चे जो बड़े ही ऊर्जावान और उत्साहित अपने प्रकृति जैसे तथा स्वस्थ दिखाई दे रहे थे तथा दो उनमें से  बड़े थे जो शायद उन तीनों के माता-पिता थे ।  माँ उनके पिता के सर से कुछ ढूँढ रही और वो नर वहीं निश्चिंत भाव से लेटा था , कितना अच्छा लग रहा था देखने में एक अजीब सा सुकून उस नर के चेहरे पर झलक रहा था।उनके बच्चे वही पास में खेल रहे थे और थोड़ी बहुत अपनी प्रकृति के अनुसार बगल में खड़े अमरूद के पेड़ से अमरूद तोड़ रहे थे, बच्चे तीन और पेड़ छोटा जल्दी ही खाली हो गया, तो उन तीनों ने अपनी पसंद का एक एक अमरूद उठाया और चल पड़े माँ की तरफ, शायद वो माँ को खिलाने जा रहे थे शायद नहीं ,हाँ तीनों ने माँ की तरफ दौड लगाई और पहुँच गए और माँ को अमरूद दिखाया ,पर माँ ने उनसे अमरूद लिए नही ,बल्कि उनके अमरूद से एक बार खाया और उन्हें वापस कर दिया ।उनका मुखिया अब भी वैसे ही लेटा था ,वह अब भी इन सब बातों पे ध्यान नही दे रहा था । वह तो सूरज की रोशनी था प्रेम के सागर में डूबा था।

                   








  पर माँ तो माँ होती है उसे पूरे परिवार का ध्यान देना होता है ।  वह उन तीनों को अपनी भाषा में कुछ बातें कही और वो तीनों वहाँ से चले गए, तथा वही छत पे पड़ी सामान की पन्नियों से खेलने लगे क्या नजारा था ,वो तीनों उन पन्नियों को सर पे पहन रहे थे,
                      जैसे ही किसी की ढँग से लग जाती दूसरा आके खराब कर जाता इस खेल के चक्कर में वो अमरूद कहना तो भूल ही गए थे। उनका पूरा ध्यान अब पन्नियों पे था पूरा छत उनके नाखूनों की खरोंच से जैसे जाग उठा था , हर कोना उनके आने की व्याकुलता में था , तभी उनमें से एक उन पन्नियों को समेटा और सीढ़ी के छत पे लेकर चढ़ गया । फिर क्या वो दोनों भी चढ़ गए और उन पन्नियों के चीथड़े उड़ाए गए ।
                     फिर वो वही बधी कपड़े सूखने की रस्सी से उतरने लगे,ये नजारा देखकर माँ बहुत व्याकुल नज़र आ रही थी ,वह उस नर के बदन से जुएँ निकालना भी बंद कर दी थी, और बड़े ध्यान से देख रही थी ,  शायद उसको पता था कि रस्सी कमजोर है, वह कुछ आवाज कर रही थी पर बच्चे उसकी बात मान नहीं रहे थे, दो तीन आवाज करने के बाद शायद उस नर की नींद टूट गई ,वह उठा और मादा की तरफ देखा तो मादा ने उसका चेहरा अपने हाथों से उन बच्चों की तरफ मोड़ दिया, और फिर से वही आवाज पर फिर भी उन तीनों ने माँ की बात पे ध्यान नहीं दिया।

                       अब क्या था अब मुखिया(नर) को गुस्सा आ गया था, वह उठा और बड़ी तेजी से उन तीनों की तरफ दौड़ा, ये नजारा देखते ही सीढ़ी की छत पर खड़े दोनों भागकर माँ की गोंद में आ बैठे ।पर तीसरा रस्सी पे लटका का लटका ही रह गया । जिसे उसके पिता ने बड़ी आसानी से उतारा और एक चमाट लगाई, फिर वो भी वहाँ से भागकर माँ की गोंद में आ बैठा । क्या दृश्य था तीनों माँ के पास चिपककर बैठे थे ,लग ही नहीं रहा था कि ये भी शैतानी कर सकते है,फ़िर माँ ने उस लटकने  वाले छोटे बच्चे को उठाया और अपने सिने से लगा लिया ,,और चल पड़े अपने किसी और दुनिया में,

                    मैं भी खो  गया अपनी बचपन की दुनिया में शायद मेरी भी कहानी बचपन में थोड़ी ऐसी ही थी………………………* आप की कहानी कैसी थी आप भी हमें बताए ,हमें और आपको अच्छा लगेगा !




🐒
           ये कहानी आपको कैसी लगी ,कृपया अपने सुझाव हमें दे ....आपका दोस्त आपका भाई प्राण mishra

                                  (pran ke parinde ...


अनमोल वचन :-

                       Sarveshwar Dayal Saxena 

हम तो ज़मीन ही तैयार कर पायेंगे

क्रांतिबीज बोने कुछ बिरले ही आयेंगे

हरा-भरा वही करेंगें मेरे श्रम को

सिलसिला मिलेगा आगे मेरे क्रम को ।

सोमवार, 20 अप्रैल 2020

college story ......

Shri Shwami Krishna Nand Inter College , Belwar Jaunpur - Home ...०🙋 Quote1:-यादें कभी झूठी नहीं होती 


   
             " परम पूज्य श्री स्वामी कृष्णानंद जी को मेरा सादर प्रणाम "


        पंचवटी की कहानी 


     सुकून की बात मत कर ऐ गालिब,
          बचपन वाला इतवार अब नहीं आता।। 

आज की तन्हाई भरी दुनिया और जद्दोजहद के बीच जो हम सबके दिलों में सबसे ज्यादा तड़पता है वो है बचपन ! 
      और हाँ किसी ने सही ही कहा है की यादों से ज्यादा खूबसूरत कुछ नहीं होता है और उसमें  भी यदि स्कूल की याद होतो  क्या कहना ,मन खुशियों की गुलाटियाँ  मारने लगता है और चेहरे पर ऐसी मुश्कान तैरने लगती है  जैसे कोई प्रेमी अपनी पहली प्रेमिका की बेटी को खेलते हुए देख  रहा  हो |   
            - तो आइये आपको अपनी कहानी में ले चलते है और साथ -साथ आपकी अपनी यादों में भी। .........  

[Teacher;s Day ki tasveer se]

            इन टूटी हुई खिड़कियों से आती हुई रोशनी और सीलन भरी दीवारों के 

बीच  आज भी कुछ हमारे छोटे गुरु भाई बहनों की गूँजती तालियों को देखकर सच

 कहूं तो बहुत सुकून मिला , क्योंकि इन तस्वीरों  के साथ लगे विडिओ  को देखकर 

अनायाश पुरानी  यादों के भवँरो ने मन में ऐसी हलचल मचाई की कुछ भाव भरी 

बूंदों की छलक चहरे तक आ गयी | 
         
          बहुत याद आते हैं वो दिन ( पंचवटी , TOM no answer ,द्रोपदी चीर हरण  

की कहानी , कबड्डी और हाँ लैब को कैसे भूल सकते हैं तथा दिन भर कुश तथा 

घाँस की पत्तियों की सेज बनाए ,हम सब दोस्त अपने-अपने आने वाले तथा बीते हुए 

कल की पहेलियाँ बूझते थे और जब पहेलियों से बनी उन कहानियों का स्वाद कुछ 

कम होने लगता तो गेट के बाहर लगे अशोक चाट का चटपटा स्वाद मिला लेते थे | 

         सच कहूँ तो वो चार साल ऐसे ही मस्ती मजाक तथा साइकिलों को छुपाने में 

निकल गए और आज इंटरकॉलेज से निकलने के 6 साल बाद। ...... 

      खुद शिक्षक के रूप में अभिर्भाव हुई वस्तुओं को पाकर बहुत अज़ीब महसूस 

कर रहा हूँ | वो स्कूल से निकले के 10 साल बाद की जिंदगी उतनी ही छोटी लगती 

है जीतनी की हमारी कक्षा (9B) के बाहर की औरि  , पर मीठी उतनी जीतनी की वो 

थी | ये बातें आपको विरोधाभाष लग सकती हैं पर जिन्होंने उसे खाया है उनसे पूछिए 

, हमारे कितने भाइयों को उसी औरि के निचे ही ज्ञान प्राप्त हुआ है , उस औरि के 

पेड़ की महानता तो वही बता सकता है  जो उस पेड़ के नीचे खड़ी साइकिल के 

ऊपर बैठकर निगाहों का तीर सीधा समकोण पर साधकर  9th B पर चलाता था 

और काला नमक और औरि के स्वाद को अपने प्रेम की पहली मिठाई मानकर खा 

     लेता था | 

       सच कहूं तो हमारे कॉलेज के बच्चों को कभी दूर द्रिष्टि दोष हो ही नहीं सकता 

,हमने सिर्फ दूर का ही देखना सीखा है पास से तो हमने कभी कुछ देखा ही नहीं | 

हम  पनी उपस्थिती के कम होने पर 5 रूपये की फ़ाईन देने में ऐसा मुँह 

सिकोड़ते थे की जैसे कोई रसगुल्ला चूसकर फेंक दिया हो | 

    हम chemistry में  हमेशा तेज रहे हैं क्योंकि हमें कुछ आये या न आये पर 

इलेक्ट्रॉनिक विन्यास जरूर आता था और जब भी देखो इसे कोई न कोई जरूर बना 

रहा होता था और जो इस भरम जाल से ऊपर उठ चूका था वो IUPAC के बड़े 

शास्त्र जाल में अपने पांडित्य पने की छुरी नुकीली बनाने  में उसी प्रकार अपने हाथ 

पैर चला रहा होता था जैसा की गाँव में धार देने वाला धार देते वक्त अपनी साइकिल 

पर अपने हाथ पैर और गर्दन चलाता था | 


 और जो इन दोनों से बचकर जीवन रसायन को चख रहा होता था वो टूटी हुई 

खिड़कियों से बाहर कूद कर अपनी बनाई हुई दुनिया में मस्त रहता था | सच कहूं 

तो उन टूटी हुई खिड़कियों से कूदने का मजा मैं आज तक नहीं भूल पाया | मैं तो 

कई बार बस कूद कर अंदर चला आता था पर कुछ देर खिड़की से  बाहर 

कूदना उतना ही मजा देता था शायद जितना एक नशेड़ी को दो घूँट पउवा | पर इस 

टूटी हुई खिड़की के खेल को खेलने के लिए कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना होता 

था ,जैसे आप जिस खिड़की से कूद कर अंदर आ रहे हैं उसमे कोई टीचर नहीं होना 

चाहिए नहीं तो मैं कई लोगो को बीच खिड़की में कुटते देखा है और दूसरी बात 

आपके साथ कोई हरामी दोस्त नहीं होना चाहिए पर ऐसा न हो ये बड़ी मुश्किल बात 

है क्योंकि बरसात में कुकुर मुत्ते नहीं उगे ये एक बार मैं मान सकता हूँ पर मेरे 

कॉलेज में हरामी दोस्त न हो ये मै मान ही नहीं सकता | अतः खिड़की से कूदते वक्त 

दोस्त की माँ की कसम देकर ही कूदे वरना आप काफी देर तक नरसिंह अवतार में 

रह सकते हैं और एक विशेष सूचना बस्ता हाथ में ही लेकर कूदना वरना अंदर     

फेंकने पर वो आपको मिले ये कोई जरूरी  नहीं है | 



IN tuti hui khidkiyo se aati hui roshani,or seelan bhari diwaro ke andar aaj bhi kuchh hamare chhote bhai bahano ki gunjati taliyan dekhkr sach kahun to bahut sukoon milaa ,kyoki anayash purani yado ke bhavaro ne aankho me esi halchal machai ki kuchh bhav bhari bundo ki chhalak chehare taka a gayi ,
             Bahut yad aate h vo din [panchavati, Tom no answer ,Dropadi cheer -haran ki kahani or kabbdi ,or han laib ko kaise bhool sakta hun tatha din bhar kush or ghas ki pattiyo ki sej banaye ham dost apne-apane aane vale or bite hue kal ki paheliyan bujhate the ,or jab paheliyo se bani un kahaniyon ka swad kuchh kam ho jata to gate ke bahr lage aashok ke chat ke thele ka kuchh chatpata swad mila lete the .
           
     

 Sach kahun to vo char sal ese hi gujar gaye or aaj apane intercollege se nikalene ke 6 sal bad  
            khud teacher ke roop me baccho se apne samman ke abhirbhav ki vastuen prapt krke bahut ajeeb mahsoos karta hun ,sach kahu to vishwas nhi hota ,vo school se nikalane ke bad ki 10 sal ki jindgi utani hi chhoti lagati h jitani ki hamare kashya ke bahar ki awari ,par meethi utani jitani vo thi ,ye baten aapko birodha bhas lag sakti h par jinhone use khaya h unse puchhiye , hamare kitane bhaiyon ko usi awari ke niche hi gyan prapt hua h ,us awari ke ped ki mahanta to vahi bata sakta h jo usake neeche khadi cycle ke upper baith kar nigaho ka teer seedha samkon per sadh kar  9th B par chalata tha or kala namak or awari ke swad ko apane prar ki pahali mithai man kr kha jata tha .


  
sach kahun to hamre college ke bachho ko kabhi door dristi dosh to ho hi nhi sakta , hamne to sirf door ka hi dekhna seekha h ham najdeek se to kabhi kuchh dekha hi nhi , Ham apne attendance ke sort hone  per 5 rups ki fine dene me  ease muh banate the ki jaise koi rasgulla choos ke fenk diya ho ,
         
  
  ham  chamistry me hamesa tej rahe kyoki hame kuchh aaye ya na aaye per hame electronic configuration jaroor aata tha ,or jab bhi dekho koi na koi ese jaroor bana ra ha hota tha or jo es bharam jal se upper uth chukka tha vah IUPAC Naming ke bade shastra jal me apne pandity pane ki chhuri ko nukili banana me usi prakar apane hath pair mar raha hota tha jis prakar  vo cycle pe girani bandha kar vo chaku chonkh karne vala apne hath pair or garden chalata tha ,

       

        Or jo en dono se bachkar jivan rasayan ko chakh raha hota tha vo tooti hui khidakiyo se koodkar apani banayi hui duniya  me masti rahta ,  sach kahu to us tooti hui khidaki se kood kar bahar jane ka maja mai aaj atak bhool nhi paya ,mai to kai bar to bas kood kar phir andar chala aata tha per kuchh der usse kood kar bahr aana utana hi maja deta tha jaise kisi nasedi ko dharre ki do ghoont ,per es tooti khidaki ke khel ko khelane ke liye kuchh baton ka vishesh dhayn rakhana hota tha jaise aap jis khidaki se kood kar andar aa rahe h us class me teacher nhi hona chahiye nhi to  kai logo ko mai beech khidaki me hi kutate dekha h ,or doosari bat apake sath koi harami dost nhi hona chahiye per esa na ho ye bada muskil h kyoki barsat ke mausam me kookur mutte na uge ye hosakta h per mere college me harami bachhe na aaye ye ho nhi skta atah khidaki se koodate vakt dost ki maa ki kasam de kar hi koode varan aap kafi der tak narsingh autar me rah sakte h or ek  vishesh suchana basta haath me hi lena h andar nhi fekana varna apaka basta mile ye koi jaroori nhi h .                        
                                                                      
                                                                         लेखक :- प्रणीत mishra 
                                                                                    (pran ke parinde...
                   धन्यवाद ,

                      
knife sharpener
धार देने वाला 
Saccharum Spontaneum | काश के फायदे व नुकसान ...
कुश 

रविवार, 19 अप्रैल 2020

Initiation (शुभारंभ

मैं एक लेखक हूँ तथा साथ-साथ एक शिक्षक भी | आप मेरे अनुभवों को पढ़ सकते हैं | 

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कलाकार प्रकृति का प्रेमी है अत: वह उसका दास भी है और स्वामी भी ।
–रवीन्द्रनाथ ठाकुर





     
                                                   



 English translation :-

I am a writer as well as a teacher. You can read my experiences.



The artist is a lover of nature, so he is his slave and also the master. –Ravindranath Thakur