कविताएँ जिनमें सच बोलता है ...
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आज की व्याप्त व्यवस्था में अवसाद और निराशा सहज ही उत्पन्न हो सकती हैं , पर इस विपरीत परिस्थिति में भी
हमें मानवीय गुणों को नहीं भूलना चाहिए ,
जैसा मैथलीशरण गुप्त जी कहते हैं। .....
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
और बची बातों को प्रकृति/परमेश्वर पे छोड़ दो। ...
(1 ) जीवन की समृद्धि का अधिकार उसी को होता है ,
जो सच के साथ खड़ा होकर झूठ का तिरस्कार करता है।
(2 )
बुझे नैनो की ज्योति सम
मुझमें भी कुछ व्याप्त रहा है।
खोल कपाट दिलों को देखा
माया का अभिशाप रहा है।
दुर्जन दुर्गुण सब प्रिय हैं अपने
जिनसे लिप्त स्वार्थ रहा है।
मोह कि चलनी से चलने को
बचा खुचा कुछ पाप रहा है ।
गजब की दुनिया है भ्राता ये
अन्याय, न्याय के साथ होता है ।
सच की डगर तकने वालों का
मूर्खों में बस नाम होता है।
सत्य की वाणी सब वेद पुराण
ये गूँगे की एक कहावत है।
सच में दिखता है वही हमें
जो जीवन, हमें दिखावत है।

https://www.instagram.com/p/B_AiYeeJ2l3/?igshid=1fwc1rlk96a00
(3 )
मूल के हैं तूल गड़े
ये शब्द हैं बड़े-बड़े
पर हम विचार से क्यों
दूर हैं खड़े-पड़े
इन सपनों की राह में
रात्रि के उद्गार में
कौन सच को सोचता है
झूठ की राह रोकता है ,
सब अपने ही स्वार्थ में
माया के सँसार में
भाग्य की इस बीन को
माथे की संगीन को
इधर-उधर हैं सोचते
खुद की राह रोकते ।
नम हुई आँख भी
जख्मी होठों के बाद भी
स्वार्थ के इस मंत्र को
भलीभांति बोलते
झूठ की इस राह को
कोई नहीं रोकते .....
धन्यवाद 💖💖🙋🙋💧
अगर आपको ये कविता पसंद आयी हो तो इसे और लोगों तक पहुचायें , आपका दोस्त आपका भाई प्राण mishra ( pran ke parinde...
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आज की व्याप्त व्यवस्था में अवसाद और निराशा सहज ही उत्पन्न हो सकती हैं , पर इस विपरीत परिस्थिति में भी
हमें मानवीय गुणों को नहीं भूलना चाहिए ,
जैसा मैथलीशरण गुप्त जी कहते हैं। .....
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
और बची बातों को प्रकृति/परमेश्वर पे छोड़ दो। ...
" करें कब क्या, इसे बस राम जानें,
वही अपने अलौकिक काम जानें। "
लेकिन अब जब दुबारा से सब ठीक हो जाये तो प्रकृति का मानवीय अधिकार से अधिक हनन करने से पहले जरूर एक बार सोचें , सब्जी लेते समय मिलने वाली पॉलीथिन को देखें क्या आप इसे स्वयं से बंद करेंगे या खुद ऐसे समय का इंतजार करेंगे जिससे आप का खुद उसमे बंद होने की नौबत आ जाए ,
प्रकृति रही दुर्जेय, पराजित, हम सब थे भूले मद में,
भोले थे, हाँ तिरते केवल सब, विलासिता के नद में। जयशंकर प्रसाद जी
जाग्रित रहें और पढ़ें मेरी लिखी हुई कुछ कविता ....
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(1 ) जीवन की समृद्धि का अधिकार उसी को होता है ,
जो सच के साथ खड़ा होकर झूठ का तिरस्कार करता है।
(2 )
बुझे नैनो की ज्योति सम
मुझमें भी कुछ व्याप्त रहा है।
खोल कपाट दिलों को देखा
माया का अभिशाप रहा है।
दुर्जन दुर्गुण सब प्रिय हैं अपने
जिनसे लिप्त स्वार्थ रहा है।
मोह कि चलनी से चलने को
बचा खुचा कुछ पाप रहा है ।
गजब की दुनिया है भ्राता ये
अन्याय, न्याय के साथ होता है ।
सच की डगर तकने वालों का
मूर्खों में बस नाम होता है।
सत्य की वाणी सब वेद पुराण
ये गूँगे की एक कहावत है।
सच में दिखता है वही हमें
जो जीवन, हमें दिखावत है।

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(3 )
मूल के हैं तूल गड़े
ये शब्द हैं बड़े-बड़े
पर हम विचार से क्यों
दूर हैं खड़े-पड़े
इन सपनों की राह में
रात्रि के उद्गार में
कौन सच को सोचता है
झूठ की राह रोकता है ,
सब अपने ही स्वार्थ में
माया के सँसार में
भाग्य की इस बीन को
माथे की संगीन को
इधर-उधर हैं सोचते
खुद की राह रोकते ।
नम हुई आँख भी
जख्मी होठों के बाद भी
स्वार्थ के इस मंत्र को
भलीभांति बोलते
झूठ की इस राह को
कोई नहीं रोकते .....
धन्यवाद 💖💖🙋🙋💧
अगर आपको ये कविता पसंद आयी हो तो इसे और लोगों तक पहुचायें , आपका दोस्त आपका भाई प्राण mishra ( pran ke parinde...
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