👴वृध्दाश्रम.......
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जहाँ तक मेरी वैचारिक शक्ति है, यह वृध्दाश्रम-वृध्द के आश्रम का बोध कराता है, जब किसी इंसानी शरीर का पौरुष जीवन की ऊँच - नीच में दौड़ाते दौड़ाते, हड्डियों को कड़क और चमड़े को साड़ी के चुनमुट में बदल देता है, कहने को तो पूरा अनुभव साथ होता है परंतु दिखाने को -एक असहाय जिंदगी के बोझ को ना उठा सकने वाले हाथ और कंधे के सिवा कुछ भी नहीं होता,,
दूसरा शब्द आश्रम, नाम सुनते ही न जाने क्यों एक निमित्त अनुशासन के बादल सोच के आसमान में मडराने लगते हैं, यकीन नहीं होता तो एक बार सोच के देखिए, कल्पनाओ के मझधार में जाईये महसूस होगा , आपको की हाँ ये तो सच है,
सोचिए ऐशी परिस्थिति में हमें कैसा लग रहा है जब कि हम केवल सोच से उस चौखट तक गए हैं, पर सोचिए उनके बारे में जो अपने जीवन का वो समय वहाँ काट रहे है , जिसमें और किसी का तो छोड़ो खुद की जिंदगी भी साथ देने को तैयार नही होती , ऐसी स्थिति में वह आदमी कैसे जिंदगी जीता है कैसे अपने बीते जीवन के सुखद सपनों को कांटे चुभें आंखों में कैसे उतारता है यह तो वही बता सकता है,
यह अविकल्पी जिंदगी की दुर्दशा भरी दशा है , जब विकल्प हो सकते थे तब तो वो इस जिंदगी को इस सोच पे बिता दिया कि उसके बच्चे काबिल होंगे और ये सच हो गया उनके बच्चे इतने काबिल हो गए कि वे इनको इतना बड़ा तौफा दिए जो की हाथों से उठ नही सकता इसलिए खुद ही इनको यहाँ पहुँचा गए , ज्यादा आगे बढ़ने के चक्कर में कई बार हम खुद से ही पीछे छूट जातें हैं .........
और हाँ पढ़े लिखें होने से अच्छा है समझदार हो जाना
प्राण mishra की कलम से...👴
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QUOTE 3:-पढ़े लिखें होने से अच्छा है समझदार हो जानाएक बार गौर से देखिए, इस शब्द को, फिर अपने जहन के अंध गलियारों से सोच की जीवंत ज्योति के प्रकाश तले पढ़िए, क्या कहना चाहता है ये,
जहाँ तक मेरी वैचारिक शक्ति है, यह वृध्दाश्रम-वृध्द के आश्रम का बोध कराता है, जब किसी इंसानी शरीर का पौरुष जीवन की ऊँच - नीच में दौड़ाते दौड़ाते, हड्डियों को कड़क और चमड़े को साड़ी के चुनमुट में बदल देता है, कहने को तो पूरा अनुभव साथ होता है परंतु दिखाने को -एक असहाय जिंदगी के बोझ को ना उठा सकने वाले हाथ और कंधे के सिवा कुछ भी नहीं होता,,
दूसरा शब्द आश्रम, नाम सुनते ही न जाने क्यों एक निमित्त अनुशासन के बादल सोच के आसमान में मडराने लगते हैं, यकीन नहीं होता तो एक बार सोच के देखिए, कल्पनाओ के मझधार में जाईये महसूस होगा , आपको की हाँ ये तो सच है,
सोचिए ऐशी परिस्थिति में हमें कैसा लग रहा है जब कि हम केवल सोच से उस चौखट तक गए हैं, पर सोचिए उनके बारे में जो अपने जीवन का वो समय वहाँ काट रहे है , जिसमें और किसी का तो छोड़ो खुद की जिंदगी भी साथ देने को तैयार नही होती , ऐसी स्थिति में वह आदमी कैसे जिंदगी जीता है कैसे अपने बीते जीवन के सुखद सपनों को कांटे चुभें आंखों में कैसे उतारता है यह तो वही बता सकता है,
यह अविकल्पी जिंदगी की दुर्दशा भरी दशा है , जब विकल्प हो सकते थे तब तो वो इस जिंदगी को इस सोच पे बिता दिया कि उसके बच्चे काबिल होंगे और ये सच हो गया उनके बच्चे इतने काबिल हो गए कि वे इनको इतना बड़ा तौफा दिए जो की हाथों से उठ नही सकता इसलिए खुद ही इनको यहाँ पहुँचा गए , ज्यादा आगे बढ़ने के चक्कर में कई बार हम खुद से ही पीछे छूट जातें हैं .........
और हाँ पढ़े लिखें होने से अच्छा है समझदार हो जाना
प्राण mishra की कलम से...👴
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