🐒🐒पाँच बंदरों का परिवार …
Quote 2 - इंतजार करने वालों के लम्हे बड़े होते हैं !
आज सुबह देरी से उठा तो सारी नित्यक्रियाये करने में 10 बज गये ,शीतलहर की छुट्टी चल रही थी
तो कहीं आने जाने का काम नहीं आज पूरे दिन कमरे पे ही रहना था ।
वही पुरानी समय सारणी को अपनाते हुए ,सुबह की प्राथमिक क्रियाओं को करके ,भगवत गीता पढ़ने छत पे आ गया ।सीढ़ियों से छत पे आते समय, सीढ़ी के दरवाज़े के नीचे की जग़ह से कुछ सूर्य का प्रकाश जैसे नये जन्मे बच्चे की तरह लालिमा लिए मानो मेरे लिए ही आ रहा था और आकर कहता कि उठो इस आलस के सागर से, दुनिया बहुत आगे निकल गई ।उठो अँधेरों में सपने देखना बंद करो, ऐसी आशावान व भावपूर्ण रोशनी को देखकर मेरे चेहरे पे खुशी की लहर दौड़ पड़ी और मैं दरवाजा खोलकर छत पे आ गया ,
तो देखा सूरज पूरी तरह निकला हुआ। वह अपने प्रकाश से सारी जगह ऊर्जा का संचार कर रहा था, मैंने उसको दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया, और अपनी भगवत गीता देखी और बैठने की जगह ढूँढने लगा ,जहाँ मैं और मेरे विचार हो बस ।
मुझे बगल में रख्खी पत्थर की पटरी पर अपने बैठने का उचित स्थान मिल गया ।मैं गीता से उसके विचार कुछ ग्रहण करता उससे पहले , मेरी नज़र वहाँ पहले से उपस्थित बंदरों पे चली गई , ये पूरे एक परिवार थे । जिसमें तीन बच्चे जो बड़े ही ऊर्जावान और उत्साहित अपने प्रकृति जैसे तथा स्वस्थ दिखाई दे रहे थे तथा दो उनमें से बड़े थे जो शायद उन तीनों के माता-पिता थे । माँ उनके पिता के सर से कुछ ढूँढ रही और वो नर वहीं निश्चिंत भाव से लेटा था , कितना अच्छा लग रहा था देखने में एक अजीब सा सुकून उस नर के चेहरे पर झलक रहा था।उनके बच्चे वही पास में खेल रहे थे और थोड़ी बहुत अपनी प्रकृति के अनुसार बगल में खड़े अमरूद के पेड़ से अमरूद तोड़ रहे थे, बच्चे तीन और पेड़ छोटा जल्दी ही खाली हो गया, तो उन तीनों ने अपनी पसंद का एक एक अमरूद उठाया और चल पड़े माँ की तरफ, शायद वो माँ को खिलाने जा रहे थे शायद नहीं ,हाँ तीनों ने माँ की तरफ दौड लगाई और पहुँच गए और माँ को अमरूद दिखाया ,पर माँ ने उनसे अमरूद लिए नही ,बल्कि उनके अमरूद से एक बार खाया और उन्हें वापस कर दिया ।उनका मुखिया अब भी वैसे ही लेटा था ,वह अब भी इन सब बातों पे ध्यान नही दे रहा था । वह तो सूरज की रोशनी था प्रेम के सागर में डूबा था।

पर माँ तो माँ होती है उसे पूरे परिवार का ध्यान देना होता है । वह उन तीनों को अपनी भाषा में कुछ बातें कही और वो तीनों वहाँ से चले गए, तथा वही छत पे पड़ी सामान की पन्नियों से खेलने लगे क्या नजारा था ,वो तीनों उन पन्नियों को सर पे पहन रहे थे,
जैसे ही किसी की ढँग से लग जाती दूसरा आके खराब कर जाता इस खेल के चक्कर में वो अमरूद कहना तो भूल ही गए थे। उनका पूरा ध्यान अब पन्नियों पे था पूरा छत उनके नाखूनों की खरोंच से जैसे जाग उठा था , हर कोना उनके आने की व्याकुलता में था , तभी उनमें से एक उन पन्नियों को समेटा और सीढ़ी के छत पे लेकर चढ़ गया । फिर क्या वो दोनों भी चढ़ गए और उन पन्नियों के चीथड़े उड़ाए गए ।
फिर वो वही बधी कपड़े सूखने की रस्सी से उतरने लगे,ये नजारा देखकर माँ बहुत व्याकुल नज़र आ रही थी ,वह उस नर के बदन से जुएँ निकालना भी बंद कर दी थी, और बड़े ध्यान से देख रही थी , शायद उसको पता था कि रस्सी कमजोर है, वह कुछ आवाज कर रही थी पर बच्चे उसकी बात मान नहीं रहे थे, दो तीन आवाज करने के बाद शायद उस नर की नींद टूट गई ,वह उठा और मादा की तरफ देखा तो मादा ने उसका चेहरा अपने हाथों से उन बच्चों की तरफ मोड़ दिया, और फिर से वही आवाज पर फिर भी उन तीनों ने माँ की बात पे ध्यान नहीं दिया।
अब क्या था अब मुखिया(नर) को गुस्सा आ गया था, वह उठा और बड़ी तेजी से उन तीनों की तरफ दौड़ा, ये नजारा देखते ही सीढ़ी की छत पर खड़े दोनों भागकर माँ की गोंद में आ बैठे ।पर तीसरा रस्सी पे लटका का लटका ही रह गया । जिसे उसके पिता ने बड़ी आसानी से उतारा और एक चमाट लगाई, फिर वो भी वहाँ से भागकर माँ की गोंद में आ बैठा । क्या दृश्य था तीनों माँ के पास चिपककर बैठे थे ,लग ही नहीं रहा था कि ये भी शैतानी कर सकते है,फ़िर माँ ने उस लटकने वाले छोटे बच्चे को उठाया और अपने सिने से लगा लिया ,,और चल पड़े अपने किसी और दुनिया में,
मैं भी खो गया अपनी बचपन की दुनिया में शायद मेरी भी कहानी बचपन में थोड़ी ऐसी ही थी………………………* आप की कहानी कैसी थी आप भी हमें बताए ,हमें और आपको अच्छा लगेगा !
(pran ke parinde ...
अनमोल वचन :-
Quote 2 - इंतजार करने वालों के लम्हे बड़े होते हैं !
आज सुबह देरी से उठा तो सारी नित्यक्रियाये करने में 10 बज गये ,शीतलहर की छुट्टी चल रही थी
तो कहीं आने जाने का काम नहीं आज पूरे दिन कमरे पे ही रहना था ।
वही पुरानी समय सारणी को अपनाते हुए ,सुबह की प्राथमिक क्रियाओं को करके ,भगवत गीता पढ़ने छत पे आ गया ।सीढ़ियों से छत पे आते समय, सीढ़ी के दरवाज़े के नीचे की जग़ह से कुछ सूर्य का प्रकाश जैसे नये जन्मे बच्चे की तरह लालिमा लिए मानो मेरे लिए ही आ रहा था और आकर कहता कि उठो इस आलस के सागर से, दुनिया बहुत आगे निकल गई ।उठो अँधेरों में सपने देखना बंद करो, ऐसी आशावान व भावपूर्ण रोशनी को देखकर मेरे चेहरे पे खुशी की लहर दौड़ पड़ी और मैं दरवाजा खोलकर छत पे आ गया ,
तो देखा सूरज पूरी तरह निकला हुआ। वह अपने प्रकाश से सारी जगह ऊर्जा का संचार कर रहा था, मैंने उसको दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया, और अपनी भगवत गीता देखी और बैठने की जगह ढूँढने लगा ,जहाँ मैं और मेरे विचार हो बस ।
मुझे बगल में रख्खी पत्थर की पटरी पर अपने बैठने का उचित स्थान मिल गया ।मैं गीता से उसके विचार कुछ ग्रहण करता उससे पहले , मेरी नज़र वहाँ पहले से उपस्थित बंदरों पे चली गई , ये पूरे एक परिवार थे । जिसमें तीन बच्चे जो बड़े ही ऊर्जावान और उत्साहित अपने प्रकृति जैसे तथा स्वस्थ दिखाई दे रहे थे तथा दो उनमें से बड़े थे जो शायद उन तीनों के माता-पिता थे । माँ उनके पिता के सर से कुछ ढूँढ रही और वो नर वहीं निश्चिंत भाव से लेटा था , कितना अच्छा लग रहा था देखने में एक अजीब सा सुकून उस नर के चेहरे पर झलक रहा था।उनके बच्चे वही पास में खेल रहे थे और थोड़ी बहुत अपनी प्रकृति के अनुसार बगल में खड़े अमरूद के पेड़ से अमरूद तोड़ रहे थे, बच्चे तीन और पेड़ छोटा जल्दी ही खाली हो गया, तो उन तीनों ने अपनी पसंद का एक एक अमरूद उठाया और चल पड़े माँ की तरफ, शायद वो माँ को खिलाने जा रहे थे शायद नहीं ,हाँ तीनों ने माँ की तरफ दौड लगाई और पहुँच गए और माँ को अमरूद दिखाया ,पर माँ ने उनसे अमरूद लिए नही ,बल्कि उनके अमरूद से एक बार खाया और उन्हें वापस कर दिया ।उनका मुखिया अब भी वैसे ही लेटा था ,वह अब भी इन सब बातों पे ध्यान नही दे रहा था । वह तो सूरज की रोशनी था प्रेम के सागर में डूबा था।

पर माँ तो माँ होती है उसे पूरे परिवार का ध्यान देना होता है । वह उन तीनों को अपनी भाषा में कुछ बातें कही और वो तीनों वहाँ से चले गए, तथा वही छत पे पड़ी सामान की पन्नियों से खेलने लगे क्या नजारा था ,वो तीनों उन पन्नियों को सर पे पहन रहे थे,
जैसे ही किसी की ढँग से लग जाती दूसरा आके खराब कर जाता इस खेल के चक्कर में वो अमरूद कहना तो भूल ही गए थे। उनका पूरा ध्यान अब पन्नियों पे था पूरा छत उनके नाखूनों की खरोंच से जैसे जाग उठा था , हर कोना उनके आने की व्याकुलता में था , तभी उनमें से एक उन पन्नियों को समेटा और सीढ़ी के छत पे लेकर चढ़ गया । फिर क्या वो दोनों भी चढ़ गए और उन पन्नियों के चीथड़े उड़ाए गए ।
फिर वो वही बधी कपड़े सूखने की रस्सी से उतरने लगे,ये नजारा देखकर माँ बहुत व्याकुल नज़र आ रही थी ,वह उस नर के बदन से जुएँ निकालना भी बंद कर दी थी, और बड़े ध्यान से देख रही थी , शायद उसको पता था कि रस्सी कमजोर है, वह कुछ आवाज कर रही थी पर बच्चे उसकी बात मान नहीं रहे थे, दो तीन आवाज करने के बाद शायद उस नर की नींद टूट गई ,वह उठा और मादा की तरफ देखा तो मादा ने उसका चेहरा अपने हाथों से उन बच्चों की तरफ मोड़ दिया, और फिर से वही आवाज पर फिर भी उन तीनों ने माँ की बात पे ध्यान नहीं दिया।
अब क्या था अब मुखिया(नर) को गुस्सा आ गया था, वह उठा और बड़ी तेजी से उन तीनों की तरफ दौड़ा, ये नजारा देखते ही सीढ़ी की छत पर खड़े दोनों भागकर माँ की गोंद में आ बैठे ।पर तीसरा रस्सी पे लटका का लटका ही रह गया । जिसे उसके पिता ने बड़ी आसानी से उतारा और एक चमाट लगाई, फिर वो भी वहाँ से भागकर माँ की गोंद में आ बैठा । क्या दृश्य था तीनों माँ के पास चिपककर बैठे थे ,लग ही नहीं रहा था कि ये भी शैतानी कर सकते है,फ़िर माँ ने उस लटकने वाले छोटे बच्चे को उठाया और अपने सिने से लगा लिया ,,और चल पड़े अपने किसी और दुनिया में,
मैं भी खो गया अपनी बचपन की दुनिया में शायद मेरी भी कहानी बचपन में थोड़ी ऐसी ही थी………………………* आप की कहानी कैसी थी आप भी हमें बताए ,हमें और आपको अच्छा लगेगा !
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ये कहानी आपको कैसी लगी ,कृपया अपने सुझाव हमें दे ....आपका दोस्त आपका भाई प्राण mishra(pran ke parinde ...
अनमोल वचन :-


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