मेरे एकांत की चीखों को चुपकराती
तुम्हारी यादों का संघर्ष, मैंने देखा है।
मैंने देखा है, तुम्हारी कपोलों का लाल गुलाबी पन
जिसकी गहराई में
कितनी इच्छाएं कितनी वासनाएँ फली फूली हैं,
जिनके स्पर्श से वक्त का बेदाग चेहरा भी
मलिन हुआ है ।
जैसे किसी गोरी के बाएं गाल की ढलान पर
काला तिल मलिन होकर भी
उसकी खूबसूरती का हॉलमार्क बन जाता है।
मैंने देखा है, पहाड़ों से लुढ़कता हुआ मद मस्त पत्थर।
जिसको अपने गिरने का मजा आता है ।
मैंने देखा है, अपने हाथों का स्पर्श
तुम्हारे कोमल बदन पर
जैसे सफेद धूल की चादर पर
छीटों के निशान हो।
मैंने देखा है, तुम्हारी आँखों में मोहब्बत की नाव
जिसे तुम बार-बार किनारे आने से रोक रही थी।
मैंने देखा है तुम्हारी साँसो की अनियमित गति
जिसकी चाल से इश्क़ की लौ
आज तक जल रही है।
मैंने देखा है तुझे हर एक शय में
जिसे दुनिया आज देख रही है।
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