हम सभी जानते हैं कि हर एक जीवंत चीज अपने आप में रचनात्मक होती है क्योंकि जीवन का एक मूलभूत लक्षण ही रचनात्मकता है और गांधीजी ने जीवन के हर एक पहलू और जीवन के हर एक रुप का सम्मान करते थे। इसलिए ही तो उन्होंने अपने जीवन का मूलभूत सार ही अहिंसा रखा क्योंकि अहिंसा ही एक ऐसे कसौटी है जिस पर चलकर सही मायने में रचनात्मकता का सम्मान हो सकता है। क्योंकि जिस चीज का सम्मान आप सम्मान नहीं कर सकते, उसका निर्माण क्या करेंगे। गांधी जी ने सांप्रदायिक एकता जातीय भेदभाव को दूर करना, शराबबंदी खाद एवं ग्रामीण उद्योग गांव की सफाई नहीं, बुनियादी, तालीम प्रौढ़, शिक्षा स्त्रियों की उन्नति स्वास्थ्य एवं सोच की शिक्षा जैसे कई पहलुओं पर बड़े सुदृढ़ और सफल प्रयास किए जिससे हमारा देश शहर, स्वाभिमान और अपने गौरव के संभल से आजाद देश की रचना कर सका।
हम सभी शिक्षा के मंदिर में उपस्थित हैं तो मैं सभी रचनात्मकता की जननी शिक्षा अर्थात अधिगम अर्थात नहीं। बुनियादी तालीम की बात करना चाहता हूं क्योंकि शिक्षा ही समस्त दोषों का एकमात्र उपचार का साधन है। गांधी जी का शिक्षा से अभिप्राय था की बालक के शारीरिक बौद्धिक और नैतिक विकास के द्वारा बालक की आंतरिक अंतर शक्तियों को विकसित करना है। साक्षरता ही शिक्षा नहीं है और साक्षरता ना तो शिक्षा का आदी है और ना ही उसका अंत यह तो मनुष्य को शिक्षित बनाने के लिए अनेक साधनों में से एक है। अतः शिक्षा का आरंभ साक्षरता से नहीं बल्कि कार्य से करना चाहिए। महात्मा गांधी ने इसी को लक्ष्य बनाकर 23 अक्टूबर 1937 को शिक्षाविदों की एक सभा बुलाई तथा बहुत विचार विमर्श के बाद निम्नलिखित सुझाव दिए गए। 7 से 14 वर्ष के बालक बालिकाओं को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा दी जाए तथा संपूर्ण शिक्षा का संबंध किसी आधारभूत शिल्प या उद्योग पर आधारित आधारित हो। सिर्फ का चुनाव बच्चे की योग्यता तथा उसकी चुचियों पर हो इस प्रकार से चित। एक बच्चे के अंदर एक कौशल का विकास हो जिससे वह आगे के जीवन में स्वावलंबी बन सके। आत्मनिर्भर बन सकें और आजाद बन सके। निर्भीक जीवन जी सके तथा परिस्थितियां कैसी भी हो। अपना आत्मविश्वास ना खोए ।
वियोग विध्वंस या नाश हो अपना या धरती समूल नष्ट हो जाए।
पुनर्निर्माण का सूत्र हो तो फिर क्या से क्या न क्या हो जाए।
विवस पलों के आंसू गिन कर नया सूत्र तुम बनाते जाओ।
दुनिया नहीं समझेगी। पर तुम खुद को समझते जाओ।
....... धन्यवाद
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