बुधवार, 16 फ़रवरी 2022

नई रचना

 कभी कोई फकीर तो कभी कोई ख़लीफ़ा होगा , 

मगर वक़्त के बदलने का एक सलीका होगा ,,

जिन कदमों के निशान दिख रहे हैं आते हुए 

शायद ये उनके जाने का सही तरीका होगा ,,



शिकस्त की दवा नहीं , 

बुझा दे जो वो हवा नहीं। 

तू इश्क लाजवाब है।

महज कोई बवा नहीं उठा। 

उठा ले अपनी उंगलियों से , 

ये जो तीरगी की राख है। 

लगे ऐसा देखकर कि 

यहां कोई जला नहीं। 

यहां कोई बुझा नहीं।



नंगी ख्वाहिशें बेताब है बाहर आने को , 

पर वह चाहती हैं तुम्हारे इशारों की ओट ,  

तुम्हारी मंजूरी का लिबास । 

जिसको पहनकर वो खिलखियाएँगी, 

मुस्कुराएंगी झूम उठेंगी 

तुम्हारी आंखों के सामने । 

तुम देखना उन्हें वो कितनी प्यारी है, 

कितनी चंचल है, 

जैसे होते हैं हिरण के बच्चे 

उतने ही चुलबुल उतने ही नाजुक। 


हम जैसे नाकाम दीवाने 

बसंत बहारें क्या जाने 

फूल की खुशबू क्या होती है 

ज़हन की बदबू क्या होती है 

हम तो इस बात पर होते हैं 

देखो आगे क्या खोते हैं, 

खून के आंसू रोते हैं 

रात को तन्हा सोते हैं। 

दर्द में इतने होते हैं 

जैसे हर वक्त के फितने होते हैं 

छोड़ो मेरा मेरा क्या है? 

तुम बताओ हाल तुम्हारा 

चंपा की कहानी कैसी है, 

वो रात की रानी कैसी है 

सबा ने फिर क्या ख्वाहिश कि 

वो जज्बाती कहानी बाईस की 

क्या कहा सब कुछ छूट गया

मोहब्बत में फिर से लुट गया 

चलो फिर आओ जुलूस बने हम 

मोहब्बत के नाम का खुलूस बने हम


किसी से ना कोई बात बताया 

किसी पे ना कोई इल्जाम दिया। 

दर्द ने हमको जब भी पुकारा 

हमने अपनी बाँहों का ईनाम दिया।


खुशियों के स्पंदन से लेकर डर के घोष तक आए ,

हम मोहब्बत के होश से चलकर मदहोश तक आए ,,


इतनी गहरी उतर गई है तीरगी 

अब तो दिल में भी अँधेरा हो रहा है













हम मोहब्बत के नाम का खुलूस बने ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें