मुझे तो खिजाँ की कोई फिक्र ही नहीं ,
उसकी एक मुस्कान बहुत है चहु ओर चमन को।
तुम्हारी खुशियां हमें बर्दाश्त है लेकिन
तुम्हारे गम हमसे देखे नहीं जाते।
युग जुगती के भरोसे छोड़कर कहाँ गए वो मदमस्त दीवाने ,
महज अधूरी रही कहानी जब से चले गए परवाने।
अपनों की नजरों में गिर जाना होता है।
सच कहने का इतना हर्जाना होता है।
जख्म हो रहा पांव में
फिर भी मलहम का लेप नहीं है।
पागल कुत्ते की भनक है फिर भी
भय का कोई चेत नहीं है।
इतनी निष्ठुर दुनिया में
सादे पन की हेठ नहीं है।
इतना साधु पन ठीक नहीं है।
देश टूट रहा है पल-पल
विचारों की खाई बढ़ती है।
जनहित की अगर बात करो तो
अंगड़ाई पड़ती है।
स्वार्थपने का अफीम चढ़ाकर
शख़्स बेहोशी वाला है
जो देश के खिलाफ बात करे
वो शख्स! .... वाला है।
उठे हुए सिर को सभी ,
झुके हुए हृदय को कोई नहीं देखता।
चाँद को देखते हैं सभी
कोई आसमा को नहीं देखता।
कैसे जीत हासिल करते हम, हर शय पर दाँव हमारा था।
जीत तुम्हारी हार हमारी , दिल तो बस बेचारा था।
नाहक ही वो टूट गया। वो तो बस दीवाना था।
चाल चली थी आँख ने मिलकर ,वो तो बस परवाना था।
उसकी आंखें मौन हुई जब,
हम आँशु की धड़कन सुनते थे।
सांस की हर एक करवट पर
पलटकर उसका माथा चूमते थे।
समाँ बुझा दी जाए अब तो
ख़ालिक का ये फरमान हुआ है।
मुझे बनाने वाला देखो,
आज मेरे घर मेहमान हुआ है।
वो तेरे हाथों का हर स्पंदन ,
धीरज दिल का चुन लेता था।
पर मेरा मन ना जाने क्यूँ
आशा के धागे बुन लेता था।
उन फ़कत कांपते होठों पर
बस सारी विवश पहेली थी ।
वैसे तो आंखें दो होती हैं
पर उस वक्त अकेली थी ।
होठों के वरक पर लिखीं हों सारी खुशियाँ ,
न कमी की कोई शिनाख्त हो कहीं से ।।
रहे सलामत ये जोड़ी तुम्हारी ,
न हो गमों की तिजारत कहीं से।।
दे दे नए कृपाँण मुझे
जीवन के दुर्दस बाण मुझे
ये नई कहानी होने दे
मुझको अपना कुछ खोने दे
मैं रसिक नही की रसपान करूँ
जीवन का लोभ में दान करूँ
मुझे अड़िग हिमालय बनने दे
सच का एक शिवालय होने दे
मैं करूणा की थाल का दीपक हूँ
सच के माथे का पीतक हूँ ।
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