बुधवार, 9 मार्च 2022

धरती और चाँद

 कल रात चाँद को देख 

धरती खुशी से झूम उठी 

जैसे रस का स्वाद जानकर 

नाच उठती है मधुमक्खी , 

जैसे माँ के पल्लू में छुपकर 

अदृश्य हो जाने की बात करती एक बच्ची , 

कल रात वैसा ही दृश्य बना था। 

आसमा से जब सफेदी बरस रही थी, 

चकोर की आँखों में प्रेम की सिल्ली पिघल रही थी।

पेड़ों की शाखाएं ऐसी झुकी थी जैसे 

दादाजी की कमर जीवन का बोझ उठाते-उठाते झुक गई हो।

मैंने अब चादर हटा दिया था अपने सर के नीचे से 

और अपने कानों को रख दिया था जमीन पर 

और मैंने महसूस किया ..............

धरती अपनेपन का मधुर गीत धीरे-धीरे  मेरे कानों में घोल रही थी, 

जिसकी मिठास और शीतलता 

आत्मा की बेचैनी भरी कड़वाहट को 

ऐसे काट रही थी जैसे चाक पर मिट्टी के बर्तन को धागा।

जिसकी अलगाव से अधूरापन नहीं बल्कि समग्रता का बोध एहसासों की दीवारों से टकराकर कर पूर्ण होने का इशारा दे रहा था। 

धरती आपकी थकान और प्रेम के अनुरूप ही अपनी कोमलता जाहिर करती है। 

आपके भावनाओं के अनुरूप!    ना कि एक सूत ज्यादा ना कि एक सूत कम।



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