शुक्रवार, 29 अगस्त 2025

अदम्य जीवन


 चंद अँधियारे डरा रहे हैं मुझको अपनी तानों से ,

मैं विप्लव का अदम्य गीत डरता नहीं सयानों से ,,

सागर होता है कितना गहरा पर लहरे नहीं डूबा करतीं है ,
विनाश के डर से आशा की ज्योति नहीं बुझा करतीं है,,

पहाड़ कितना भी ऊँचा हो पर आसमान नहीं छुआ करते है 
पंक्षी अपने हौशलों से नभ में स्वछंद विचरा करते है,,

वियोग, विध्वंस या विनाश हो अपना या धरती समूल नष्ट हो जाए 
पुनः निर्माण का सूत्र हो तो फिर क्या से क्या न क्या हो जाए 

विवश पलों के आँसू गिनकर नया सूत्र तुम बनाते जाओ ,
दुनिया नहीं समझेगी तुमको पर तुम खुद को समझते जाओ !!!!








रविवार, 24 अगस्त 2025

आँखे दुख से फटी रहती है उम्मीद के धागे सी जाएँगे

 एक साथ मिला तो मर जाएंगे 

सपना देखो जी जाएँगे 

जो एक जगह बैठे रहते हो

जीवन लम्हें पी जाएंगे

आँखे दुख से फटी रहती है

उम्मीद के धागे सी जाएँगे 

अब ये कैसी ज़िद है तुम्हारी 

साथ तुम्हारे ही जाएँगे




न जाने अब क्या निकलेगा मुझसे


 मैं अब तन्हाई का मारा हुआ हूँ 

माँ कहती थी क्या प्यारा हुआ हूँ

पानी जो इश्क़ का गुज़रा है बीच से 

उससे तो बस किनारा हुआ हूँ 

होने को सूरज भी हो सकता था लेकिन 

ब मुश्किल से बस सितारा हुआ हूँ

न जाने अब क्या निकलेगा मुझसे 

ऐसा एक जादुई पिटारा हुआ हूँ




शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

🪷और तुम्हें हम क्या बतलाएँ क्या भारत की गाथा है🫂🇮🇳

जिसने दिया हो ज्ञान की गंगा 

जहाँ पे धरती माता है 

जहाँ भाग्य से कुछ नहीं मिलता 

कर्म किया तो पाता है

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है


एक जन्म की बात नहीं है 

पुनर्जन्म भी आता है 

जिसके कर्म श्रेष्ठ रहे हो 

वही यहाँ पर आता है 

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है 


राणा के भाले से लिपटा 

स्वाभिमान का परचम है 

तुलसी का रामायण जैसे 

मुँह में घुलता चमचम है 

ऐसी अनेक कहानी जिसमें 

सहज अपनापन आता है

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है 


वीर शिवाजी की गाथायें 

जहाँ लहू में रची बसी हो 

जहाँ पदमिनी अंगारों पर 

खिलती जैसे एक कली हो 

ऐसी पावन भूमी पर 

व्यर्थ नहीं कोई आता है

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है 


जहाँ पे बिटिया ख़ानदान की 

लक्ष्मी समझ पली बड़ी हो 

जहाँ पे माता पुत्रों के संग 

विपदाओं में साथ खड़ी हो 

ऐसे ही नहीं यहाँ भी जीवन 

दुख में भी मुश्काता है 

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है 


जिसने दिया हो ज्ञान की गंगा 

जहाँ पे धरती माता है 

जहाँ भाग्य से कुछ नहीं मिलता 

कर्म किया तो पाता है

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है


एक जन्म की बात नहीं है 

पुनर्जन्म भी आता है 

जिसके कर्म श्रेष्ठ रहे हो 

वही यहाँ पर आता है 

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है 


राणा के भाले से लिपटा 

स्वाभिमान का परचम है 

तुलसी का रामायण जैसे 

मुँह में घुलता चमचम है 

ऐसी अनेक कहानी जिसमें 

सहज अपनापन आता है

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है 


वीर शिवाजी की गाथायें 

जहाँ लहू में रची बसी हो 

जहाँ पदमिनी अंगारों पर 

खिलती जैसे एक कली हो 

ऐसी पावन भूमी पर 

व्यर्थ नहीं कोई आता है

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है 


जहाँ पे बिटिया ख़ानदान की 

लक्ष्मी समझ पली बड़ी हो 

जहाँ पे माता पुत्रों के संग 

विपदाओं में साथ खड़ी हो 

ऐसे ही नहीं यहाँ भी जीवन 

दुख में भी मुश्काता है 

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है 


जहाँ पिता आदर्श पुत्र का 

सरल साँवला भँवर चित्र का 

आँखों में आँसू भर भर के 

कुल के गीत सहज गाता है

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

यही भारत की गाथा है…!!!


 🇮🇳 जय हिन्द जय भारत 🇮🇳 

✍️प्रणीत मिश्र🙏