चंद अँधियारे डरा रहे हैं मुझको अपनी तानों से ,
मैं विप्लव का अदम्य गीत डरता नहीं सयानों से ,,सागर होता है कितना गहरा पर लहरे नहीं डूबा करतीं है ,विनाश के डर से आशा की ज्योति नहीं बुझा करतीं है,,पहाड़ कितना भी ऊँचा हो पर आसमान नहीं छुआ करते हैपंक्षी अपने हौशलों से नभ में स्वछंद विचरा करते है,,वियोग, विध्वंस या विनाश हो अपना या धरती समूल नष्ट हो जाएपुनः निर्माण का सूत्र हो तो फिर क्या से क्या न क्या हो जाएविवश पलों के आँसू गिनकर नया सूत्र तुम बनाते जाओ ,दुनिया नहीं समझेगी तुमको पर तुम खुद को समझते जाओ !!!!

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें