रविवार, 8 जनवरी 2023

18 jan ganga nagar kavi sammelan

 लहू जिगर का तेरे माथे पर उड़ेल दिया हमने ,

अब ये लाल रंग ना आए तो मैं क्या करूँ ||

मैं जमाने का दोष  मानता हूं लेकिन ,

मुझे अपना ही नजर आए तो मैं क्या करूँ ||

बेच रहा हूं दिल को दिल के ही भाव में ,

कोई खरीदने ही नहीं आए तो मैं क्या करूँ ||


बेवजह मोहब्बत कर चुका हूँ मैं 

अब मुझे नसीहतओं के अल्फाज मत दो 

मैं पीना चाहता हूँ आंखों से तुम्हारे 

तुम मेरे हाथों में अब ये जाम मत दो 


जब से छुड़ाया है मैंने हाथ तुझसे 

लकीरें जिंदगी की चमक ने लग गईं है


मैं तुझसे मोहब्बत स्वीकार नहीं करता 

पर ऐसा नहीं है कि तुझसे प्यार नहीं करता 


ज्योति बुझे अगर आशा की तो बनदीप निराशा मत जलना 

चलना इस दुनिया में कठिन है लेकिन ये बात समझ कर मत चलना 


बनाकर खुद को तलब जहां में 

जुदा हुआ निखर गया 

मेरी निगाह का तारा मेरा 

होने से पहले बिखर गया 


मेरे लगाए पेड़ अब सूखने लग गए 

तेरे दिए दर्द मुझे दुखने लग गए 

बहुत देर तक यादों की चाहत में बैठा रहा मैं 

फिर जब आई तेरी याद तो हम उठने लग गए


आँसुओं को कागजों पर सुखाया ना करो 

मैं बुलाऊं तो एक बार में आया ना करो ||

मुझे जरूरत है जमाने में मोहब्बत की बहुत 

मैं कुछ बोलूं तो हर बार शर्माया ना करो ||

जब मैं हार कर पुकारूँ तुम्हें तन्हाई में अपनी 

तुम चुपचाप दबे पांव यूँ आया ना करो ||

यह पूछ कर क्या अच्छा है बदन में तुम्हारे 

यूँ सरेआम मोहब्बत में भरमाया ना करो ||


सूने पन के परिभाव से दिल बच्चा हो जाएगा 

हर पल उसको ना याद करो दिल कच्चा हो जाएगा 


तुझ से लिपटे तो मरेंगे ही 

सोच रहे हैं तुम्हें देख कर क्या होगा 

है शिकायत की आरजू बहुत 

मगर ये करके भी क्या होगा


समुंदर से कुछ ज्यादा चाहिए 

मुझे तुझसे एक वादा चाहिए 

बहुत रंगीनियत मुझे पसंद नहीं 

तेरा किरदार मुझे सादा चाहिए


जब तक मोहब्बत नहीं हुई थी 

मैं टूटे हुए दिल को बेकार कहता था 

तुम्हारे जाने के बाद आँसुओं को 

आँखों में आना श्रृंगार कहता था


अब पढ़ रहा हूं तो अधूरा लग रहा है 

वही खत जो कभी तेरा पूरा होकर लिखा था


आधे दिसंबर में आ गए हम जमीन से अंबर में आ गए


तेरी तस्वीर क्या लगा रखी है मैंने ऊपर के जेब में 

लोग पूछ रहे हैं ये गुलाब कौन सा है 


वफा की है कि जफ़ा की है 

पर मोहब्बत तो इस दफ़ा की है 


सांप दबा रहे और कांटे भी ना 

कुत्ता पास आए और चाहते भी ना 

ऐसा वाक्य बहुत मुश्किल से होता है


जैसे अंधे के लिए नजरिए का कोई कायदा नहीं होता 

वैसे ही शरीफ लोगों को धंधे में कोई फायदा नहीं होता


अंत में सारा इल्जाम प्यार करने वाले पर आएगा 

वो तो बेवफा है वो तो आकर चला जाएगा


गम खत्म हो रहे हैं जिंदगी के 

आइए मुझे बददुआएं दीजिए 


तुम्हारे दिल तोड़ने पर खफा नहीं है 

इससे पहले थे पर इस दफा नहीं है 


सिलवटें चादरों की हटाई नहीं जाती 

वह आ जाए तो यह बात बताई नहीं जाती 

तन्हाई इतनी कि कोई हाल भी नहीं पूछता मुझसे 

और भीड़ इतनी कि मुझे मेरी आवाज भी सुनाई नहीं देती 

मैं रो-रोकर आईने में देखता हूं अपनी आंखें 

क्यों इसमें तेरे सिवा कोई बात दिखाई नहीं देती


वतन की डाल में टांके हैं त्याग के फूल हमने 

हमारे उछाले हुए सिक्के कभी खोटे नहीं होते


तुम किसी और के बिस्तर की चांदनी हो 

तुम मेरी रातों को यूं बदनाम मत करो 

ये जवानी बड़ी पाक साफ चीज है 

तुम इसे हर किसी के नाम मत करो 


शयाशतों के दाँव हमें अच्छे नहीं लगते 

हम अगर दुश्मनी करते तो बच्चे लगते 


बदन से रूह के मिलने का परिणाम है धड़क 

हमारी आंखों से मंजिल का अनुमान है सड़क


लहरों को किनारे आ जाना ही चाहिए 

जब वक्त हो बिछड़ जाने का तो बिछड़ जाना ही चाहिए 

यहां शराफत की कोई उम्मीद नहीं लेकिन

जब कोई मर जाए तो झुक जाना ही चाहिए 


बीते हुए दिनों के घाव देखने से अच्छा है 

हम भविष्य के रास्ते से कांटे हटाएँ 


बहुत देर से सोच रहा हूँ  तेरी तस्वीर देख कर 

यह मुस्कान तेरे चेहरे से पिघल क्यूँ नहीं जाती 

मैं तो चलो परदेश में हूँ  तन्हा हूँ  मजबूर हूँ  

तू मेरे जहन से निकलकर घर क्यों नहीं जाती


बेवजह मोतियों को बर्बाद ना कर 

मैं आ रहा हूं तुझसे मिलने तू याद ना कर 

इन लकीरों को तगाफुल की नजर से देख 

तू हीर है जमाने का एहतराज ना कर 

माना कि जुदाई के वक्त बहुत हैं 

तू खामखाँ शिकायत में वक्त बर्बाद ना कर 

ये कयामत ही तो है जो जुदा है हम दोनों 

अब तो किसी और जलजले का इंतजार ना कर 


जख्म हमारे सिले नहीं और 

नमक का व्यापार बढ़ा है 

दर्द का चेहरा ओढ़े देखो 

सामने से संसार खड़ा है 

इस नीरव रुदन भरी आंखों में 

आंसू का कोई शोर लिखे क्या 

ऐसे डरे बुझे दीपक में 

ज्योति का कोई मेल लिखे क्या


एक दिन तड़पेंगे वो भी हमारी याद में 

एक दिन उनको भी मोहब्बत पे एहतराम होगा

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