शनिवार, 14 जनवरी 2023

मन पसंद

 मुझ जैसे को तड़पाने से पहले तुझे एक बार तो सोचना था।

तुझे किसी और के होने से ज्यादा मेरा होना था।


तेरा चेहरा मुझे किताब लगता है। 

अंधेरे में उगा हुआ महताब लगता है।

कैसे बताऊं मैं हसरते दिल की 

तू इसे कितना लाजवाब लगता है?


अधूरा ख्वाब को रख दिया है ताक पर , 

अब मैं उसे पूरा होकर उतारूंगा ।


इस रास्ते में कोई दाँव नहीं लगेगा। 

मोहब्बत का कोई छांव नहीं लगेगा। 

भले रहीस हो जमाने में तुम मगर 

इश्क किसी के पाँव नहीं लगेगा।


ख्वाब को तामीर करते हुए रो दिए , 

हम अपने आप को जागीर करते हुए रो दिए। 

वो इतना दूर चला गया मेरी बाहों से , 

कि हम उसको आवाज लगाते हुए रो दिए। 

एक ही तो हुनर सीखा था हमने मोहब्बत में , 

सो उसकी याद आयी और हम हुए रो दिए।


सुकून का एक कतरा भी हमारे नाम नहीं आया | 

तुम्हारी याद का मौसम हमारे कोई काम नहीं आया || 

मैंने घोल कर आंसू कुछ फीके किये मगर ,

ये जज्बात का फीकापन भी कोई काम नहीं आया ||  

उलझ गई दर्द की कहानी खुद मुझसे ,

मेरा किरदार का सीधापन कोई काम नहीं आया || 

ले जाए जिसे जरूरत हो इस बेतुक की चीज को ,

ये दिल तो मेरे कभी कोई काम नहीं आया ||


तट पर पटक-पटक कर माथा 

सागर खारे हो जाते हैं | 

पंछी उड़ कर पिजरे से अपने 

और भी प्यारे हो जाते हैं ||



नंदी की ज्ञानवापी प्रतीक्षा!!


 दुख के दिन अब दूर हुए 

ये कष्ट के मोती झड़ जाने दो । 


हुई तपस्या पूर्ण तुम्हारी 

घर में फिर से शिव आने दो। 


मूद लो अब इंतजार की आँखें 

सच को अब कोई डर नहीं है। 


पर तेरे जैसा निरखने वाला 

माना कोई सर नहीं है। 


इतने वर्षों से तूने हाँ 

बेईमानों को कैसे झेला।


जहाँ सत्य जिंदा हो जल में 

वहॉं झूठ का कैसा मेला। 


इतने विवश! अगर हम होते 

तो सच में पत्थर हो जाते!!


या तो खींच जुबान झूठ की 

ख़ालिस कट्टर हो जाते हैं!


सच कहती है माँ की वाणी,  

शिव से सुंदर कुछ भी नहीं है!!

 

झूठ के अंदर बहुत राज हैं! 

सच के अंदर कुछ भी नहीं है।।


🕉️सत्यम शिवम सुंदरम🕉️✍🏻🙏


दे दे नए कृपाँण मुझे 

जीवन के दुर्दस बाण मुझे 

ये नई कहानी होने दे 

मुझको अपना कुछ खोने दे

मैं रसिक नही की रसपान करूँ

जीवन का लोभ में दान करूँ

मुझे अड़िग हिमालय बनने दे

सच का एक शिवालय होने दे

मैं करूणा की थाल का दीपक हूँ

सच के माथे का पीतक हूँ ।


उसकी आंखें मौन हुई जब, 

हम आँशु की धड़कन सुनते थे। 

सांस की हर एक करवट पर 

पलटकर उसका माथा चूमते थे। 

समाँ बुझा दी जाए अब तो 

ख़ालिक का ये फरमान हुआ है। 

मुझे बनाने वाला देखो, 

आज मेरे घर मेहमान हुआ है। 

वो तेरे हाथों का हर स्पंदन , 

धीरज दिल का चुन लेता था। 

पर मेरा मन ना जाने क्यूँ 

आशा के धागे बुन लेता था। 

उन फ़कत कांपते होठों पर 

बस सारी विवश पहेली थी ।

वैसे तो आंखें दो होती हैं 

पर उस वक्त अकेली थी ।



कोई कुछ भी कह ले, मगर आस नहीं जाती। 

बिना पानी के कभी प्यास नहीं जाती।


हां जाती हैं तुम्हारे जाने के बाद कई बसें 

मगर उनको देखकर मेरी जान नहीं जाती।


बहुत जोर से चिल्लाओगे तो गला फटेगा 

वो जहाँ है वहाँ आवाज नहीं जाती।

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