अगर जमाने में कहीं हम
चिड़िया हो जाते....
तो एक डाल पर बैठे होते
एक से उड़ कर जाते
दुनिया वालों की आंखों में
हद से ज्यादा हम भाते
कहीं आसमां के साए में
खुद को उड़ता हम पाते
कहीं नदी के साथ दौड़ में
खुद को पिछड़ा हम पात
पर ना जाने किस पाप-पुर्ण्य के
लेखे में हम दूर हुए
इस मानव जीवन जीने को
हद से ज्यादा मजबूर हुए
उफनती नदी की नाव में एक आशिक की कहानी हो तुम
जो पूछ रहा है दरिया से क्या सचमुच में पानी हो तुम
काँटों की खुशामद में लग गईं वो तितलियां जो फूल की हकदार थी
जिंदगी इस कदर बाँट देती है मोहब्बत को जैसे वो भी इसमें हिस्सेदार थी
तुम्हारे रूप के सदके हैं हजारों
तुम्हारा बदन कयामत में शुमार होगा
तुम इस तरफ न करो अपनी नजरों की छोरी
ये तो मेरे दिल के आर पार होगा
लबों की खास मेहरबानी से पहले
मैं लेता हूँ तुम्हारा नाम पानी से पहले।
सूखे हुए गुलाब को सफाई दे रहा हूँ।
मैं आज अपने इश्क को दुहाई दे रहा हूँ।
नए रँग की इस कहानी में हो,
तुम मेरे साथ मेरी जवानी में हो।
मैं तुम्हें देखकर सोचता हूँ यही,
तुम मेरी आँख के कितने पानी में हो?

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