एक दिन जमे हुए खून के कतरे से बात कर रहा था मैं
बहुत खुश था बदन के थका देने वाले सफ़र से परे
धूल की इस बेनाम दुनिया में आकर
हालांकि अभी भी उसका पैतृक नाम जिंदा है उसमें
पर वो नहीं चाहता कि कोई उसे उठाए और नाम लगी कांच की पट्टी पर चिपका दें
वो तो अभी खून का कतरा भी नहीं रहना चाहता , सुबूत तो बहुत दूर की बात है |
दुनिया की सारी चीखों को पिघलाकर अगर एक शब्द बनाया जाए तो
उसका रूप हूबहू बेबसी से मिलेगा
क्योंकि चीखें बेवजह के सितम की कोख से जन्म लेती हैं
और इस दुनिया के कमजोर लोगों के बदन से चिपक जातीं है
जो परिस्थितियों के मारे हैं
जिन्हें वक्त ने अपनी नाव से नीचे उतार दिया है
और वे बेबस है इस दुख के समुंदर में डूब जाने के लिए।…

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👏👏👍🏻
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