शनिवार, 29 अप्रैल 2023

खून का कतरा

 एक दिन जमे हुए खून के कतरे से बात कर रहा था मैं 

बहुत खुश था बदन के थका देने वाले सफ़र से परे 

धूल की इस बेनाम दुनिया में आकर 

हालांकि अभी भी उसका पैतृक नाम जिंदा है उसमें  

पर वो नहीं चाहता कि कोई उसे उठाए और नाम लगी कांच की पट्टी पर चिपका दें

 वो तो अभी खून का कतरा भी नहीं रहना चाहता , सुबूत तो बहुत दूर की बात है |

 दुनिया की सारी चीखों  को पिघलाकर अगर एक शब्द बनाया जाए तो

उसका रूप हूबहू बेबसी से मिलेगा 

क्योंकि चीखें बेवजह के सितम की कोख से जन्म लेती हैं 

और इस दुनिया के कमजोर लोगों के बदन से चिपक जातीं है 

जो परिस्थितियों के मारे हैं 

जिन्हें वक्त ने अपनी नाव से नीचे उतार दिया है 

और वे बेबस है इस दुख के समुंदर में डूब जाने के लिए।… 




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