धर्मों के सुलझे किस्से अब
पहेली बन सर पर छाये हैं
जिनको धर्म का पता नहीं वो
सबको धर्म सिखाने आए हैं
ममतामयी प्रणाम ही है वो
जो सब धर्मों का मूल मन्त्र है
मातृ-पितृ ही सब पंथों में
सबसे ऊँचे मूल मन्त्र है
खुद के शौक शखावन खातिर
निज उर तक को बेंच दिए हैं
हमने इस जीवन को कितने
आड़े तिरछे पेंच दिए हैं
सहज नहीं जीवन का मोति
सहज नहीं यश का ये मोति
हमको इतना भान हुआ है
डरकर जीने वालों का कब
इस जग में सम्मान हुआ है
किस्मत पर ही आ टिकी सारे कर्मों की रेस
अपना नाम फकीर था हम जाते किस देश
ना तो किसी से चाहिए गम का तराजू
ना तो किसी से खुशी का बाट चाहिए
बस एक ही ख्वाहिश है मेरी जमाने में
मुझे बस आप सभी का साथ चाहिए
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