वयसराय गया छोड़कर पर राय हमारी वही रही
आजादी हर नाम में थी पर हाय गुलामी वही रही
वही रंग और भेद दिलों में
वही द्वेष का खेल जिलों में
वहीं जहां में वही जहन में
ये कैसा अंतर है बहन में
अपनी मिट्टी अपनी काया
अपना सूरज अपनी छाया
अपने में ही जप्त रहे हम
अपने से ही तृप्त रहे हम
कहा उन्होंने छुद्र हमी हैं
कहा उन्होंने कायार है
कहां है हमें ज्ञान की बातें
कहां हममें शायर हैं
उनकी हर क गाली पर
हमने चुप की हांमी दे दी
अपनी जहन को देखो हमने
सोच की गुलामी दे दी
हाँ माना ये सब दोष हमारे
अज्ञानता के हैं सहारे
पर यही समय है
यहीं युक्ति होगी
गुलामी की हर सोच से मुक्ति होगी
नहीं बनेगा राजा कोई
नहीं किसी का हक खाएगा
जो जितना अच्छा कर्म करेगा
उतना अच्छा फल पाएगा
मोहब्बत रेत को मोति बना देती है
भूख घांस को भी रोटी बना देती है
अगर जज्बा ना हो आजाद रहने का
तो दुनिया हर शख्स को कैदी बना देती है
और पत्थरों से नहीं फूलों से बनेगी
हमारी कहानी उसूलों से बनेगी
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