सोमवार, 28 अप्रैल 2025

हम ना जाने कितने बार उजड़ गए

 सूनेपन के साथ चला तो खामोशी ने मुँह बिचकाया 

अधरों की जो बात कही तो नयनों ने फिर मुँह बिचकाया 

ऐसी वैसी हर आंधी में जाने कितने पेड़ उखड़ गए 

तुम्हें पाने की चाहत में हम ना जाने कितने बार उजड़ गए 


दरिया ने जो लहरें भेजी हमने उनको भी इनकारा 

सागर बन बदल बरसा तो हमने उसको भी इनकारा 

इतने सारे तारे जब जिने पर मिलने आए तो 

हमने उनके हाथ पकड़कर चाँद की तरफ़ किया इशारा



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