गुफ्तगू अँधेरों की भा जाएगी मुझको ,
लगता है ये उदासी खा जाएगी मुझको ,,
तुम्हें दीवारों से राब्ते की कोई खबर नहीं ,
ये नई दिल लगी ही तो ढा जाएगी मुझको ,,
चिरागों की सिसकियाँ नहीं देखी जाती मुझसे
मैं सूरज के इंतजाम पे काम कर रहा हूँ ,
जिंदगी में जितने की हैसियत नहीं है मेरी
उससे ज्यादा के, घर के काम कर रहा हूँ ,,
तुम्हें आसान लगती है आजादी की कहानी यारों ,
बदन का लहू नहीं है पानी यारों ,,
कितनों ने घर कितनों ने जवानी छोड़ी ,
तब जाके हर एक की किश्मत में ये निशानी छोड़ी,,
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