इससे आगे का जवाब नहीं आता,
मोहब्बत बीच में हो तो हिसाब नहीं आता।
तुम बुलाते हो तो आ जाते हैं गैर भी कई ,
हम बुलाते हैं तो अहबाब भी नहीं आता।
हमें मंजूर है मोहब्बत में गुलामी क्योंकि,
तुमसे दूर रहकर भी तो इंकलाब नहीं आता!
तुम्हारे न्याय हमें क़ुबूल नहीं हैं ,
हमें खुद की अदालत खोलनी है ,,
जो पट्टी आँख पर बाँधी है तुमनें ,
उसे एक तमाचे से बस खोलनी है ,,
अदम्य साहस की जुबानी , हमी पर अब जवां होने लगी है ,,
दुःखों का दौर अब जा चुका है , कहानी अब दवा होने लगी है,,
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