दर्द की दुनिया का पंछी हूँ
हद की मंजिल जाना है।
मुझे मुसाफिर बना कर देखो
मेरे अंदर एक परवाना है।।
ये जख्म के गहरे दाग देख लो
या लाल आंसुओं की कतार ।
मेरे उन्मुक्त जीवन पर बरसी
ना जाने कितनी अनंत कटार ।।
पर फिर भी ,
मैं सुबहे अरुण सा चमक रहा हूँ
अंधेरों पर दमक रहा हूँ ।
तुम तो अपनी आँख खोल लो
सच क्या है, ये बात बोल लो ।।
रसना का उपयोग यही है
सच कहूं तो भोग यही है ।
आओ उठाकर शमशीरें
दे दें तिलिस्म की छाती में ।
या करें वार भीषण उसपे
जो खेल दिखाए रात्रि में ।।
यहाँ कोई भाग्य नहीं है
कर्मठता से पहले ।
मानवता का मूल नहीं है
निर्मलता से पहले।।
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