बुधवार, 26 नवंबर 2025

उठो जवानो हम भारत के स्वाभी मान सरताज़ है

                                                          उठो जवानो हम भारत के स्वाभी मान सरताज़ है

अभिमन्यु के रथ का पहिया, चक्रव्यूह की मार है

चमके कि ज्यों दिनकर चमका है उठे कि ज्यो तूफान उठे
चले चाल मस्ताने गज सी हँसे कि विपदा भाग उठे
हम भारत की तरुणाई है माता की गलहार है
अभिमन्यु के रथ का पहिया.... 

खेल कबड्डी कहकर पाले में न घुस पाये दुश्मन
प्रतिद्वंदी से ताल ठोक कर कहो भाग जाओ दुश्मन
मान जीजा के वीर शिवा हम राणा के अवतार है
अभिमन्यु के रथ का पहिया.... 

गुरु पूजा में एकलव्य हम बैरागी के बाण है
लव कुश की हम प्रखर साधना शकुंतला के प्राण है
चन्द्रगुप्त की दिग्विजयों के हम ही खेवनहार है
अभिमन्यु के रथ का पहिया.... 

गोरा, बादल, जयमल, फत्ता, भगत सिंह, सुखदेव, आज़ाद
केशव की हम ध्येय साधना माधव बन होती आवाज़
आज नहीं तो कल भारत के हम ही पहरेदार है
अभिमन्यु के रथ का पहिया.... 

उठो जवानो हम भारत के स्वाभी मान सरताज़ है
अभिमन्यु के रथ का पहिया, चक्रव्यूह की मार है

बुधवार, 19 नवंबर 2025

रविवार, 5 अक्टूबर 2025

तुम हिम्मत कर चलते रहना sahab ji

 जब पाँव तुम्हारे रुक जाएं 

आँखों में आँसू चुभ जाए 

मंज़िल  की सारी उम्मीदें 

दिल आग बनें और फूँक जाएँ 


संग्राम अगर हारे भी तो 

सेना साधन वारे भी तो 

तुम मन को छोटा मत करना 

बस हिम्मत कर चलते रहना


जब कहने वाले कहते हों 

 सब घाव पोर से बहते हो 

 हर और निराशा छाई हो 

असफलता हो तनहाई हो तो


सारा सब कुछ बर्बाद रहे 

सब पीड़ा ही आबाद रहे 

दुनिया तुमको समझाएगी 

चलते पाथ से भटकाएगी 


फिर भी अपने मन की करना 

जिद करते थे करते रहना 

तुम हिम्मत कर चलते रहना 


आराम नहीं अपना आसान 

लड़ना ही है जय का साधन 

पर हिम्मत रखना यार मेरे 

लहरों से ना पतवार डरे 


तूफ़ान का रास्ता मोड़ेंगे 

मौजों की बाँह मरोड़ेंगे 

सूरज का माथा चूमेंगे 

हम भी मस्ती में झूमेंगे 


संघर्षों के ये सब किस्से 

आगे नशीन दुहराएँगी 

एक नाम तुम्हारा ले लेकर 

ज़िद का परचम लहराएँगी 


एक दिन वो भी आएगा  

जब सारे ग़म धूल जाएँगें 

ये निंदा करने वाले ही 

तब जय जय कार लगाएँगें 


ये पीड़ा ताज बनेगी तब 

ये ज़ख्म लिखेंगे तहरीरें 

रणधीर भले मर जाता है 

ज़िंदा रहती हैं शमशीरें 


से जीत हर की उलझन सें 

आगे बढ़ना बढ़ते रहना 

बस हिम्मत केआर चलते रहना 





……..रितेश _रजवाड़ा 







सोमवार, 22 सितंबर 2025

श्री विन्ध्येश्वरी स्तोत्रम

 

  • निशुम्भ शुम्भ गर्जनी,
    प्रचण्ड मुण्ड खण्डिनी ।
    बनेरणे प्रकाशिनी,
    भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

    त्रिशूल मुण्ड धारिणी,
    धरा विघात हारिणी ।
    गृहे-गृहे निवासिनी,
    भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

    दरिद्र दुःख हारिणी,
    सदा विभूति कारिणी ।
    वियोग शोक हारिणी,
    भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

    लसत्सुलोल लोचनं,
    लतासनं वरप्रदं ।
    कपाल-शूल धारिणी,
    भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

    कराब्जदानदाधरां,
    शिवाशिवां प्रदायिनी ।
    वरा-वराननां शुभां,
    भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

    कपीन्द्न जामिनीप्रदां,
    त्रिधा स्वरूप धारिणी ।
    जले-थले निवासिनी,
    भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

    विशिष्ट शिष्ट कारिणी,
    विशाल रूप धारिणी ।
    महोदरे विलासिनी,
    भजामि विन्ध्यवासिनी ॥

    पुंरदरादि सेवितां,
    पुरादिवंशखण्डितम्‌ ।
    विशुद्ध बुद्धिकारिणीं,
    भजामि विन्ध्यवासिनीं ॥

शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

मुक्ति करता हूँ मैं जाना चाहो अगर पर सभी का बदलता समय है प्रिये….२

 मुक्ति करता हूँ मैं जाना चाहो अगर 

पर सभी का बदलता समय है प्रिये….२

अब बदलना तुम्हारा तो है लाज़मी 

लूट चुका है हमारा सहारा अभी 

पर श्रवण रन्ध को खोल कर सुन लो ये 

सच परेशान है, है ना हारा अभी 

देह मानव का धारण किया जिसने भी 

उसका कष्टों से लड़ना तो तय है प्रिये 

मुक्त करता हूँ मैं जाना चाहो अगर…….


मेरा दुख वो नहीं प्रेम में जो मिले 

मुफ़लिसी का हूँ मैं तो सताया हुआ 

राबता करना लोगों से मुश्किल है अब 

मैं तो इंशान हूँ मात खाया हुआ 

कुछ भी सोचा हुआ कर नहीं पा रहा 

एस जीवन में आया प्रलय है प्रिये 

मुक्ति करता हूँ मैं जाना चाहो अगर 

पर सभी का बदलता समय है प्रिये….२

Happy friendship Day

 लग जाए ज़ख्म पे पट्टी तो उसका घाव नहीं होता

जहाँ हो प्यार की डोरी वहाँ मोल भाव नहीं होता 
हाँ माना खून का रिश्ता नहीं है हम सभी में पर
ना होता दिल से कोई रिश्ता तो ये दोस्ती का चुनाव नहीं होता






शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ ✍️ 👣 🫵

 परख नली से पहले परखा 

जीवन के सूखे में बरखा 

दुख को काट 

सुख को चरखा 

ऐसा जीवन योग रहा है 

शिक्षक होना संयोग रहा है



वर्तमान की भीड़ मिली तो 

हमनें भविष्य के नीड़ बनाए 

मन ने जब-जब विचलन माँगा 

तो,हमनें कस के जंजीर बनाए 

अंधकार की हर दुविधा में 

दीपक होना योग रहा है 

शिक्षक होना संयोग रहा है


वर्तमान की भीड़ मिली तो 

हमनें भविष्य के नीड़ बनाए 

मन ने जब जब विचलन माँगा 

तो,हमनें कस के जंजीर बनाए 

अंधकार की हर दुविधा में 

दीपक होना योग रहा है 

शिक्षक होना संयोग रहा है


जिन्होंने सिर्फ़ कामना की थी 

हमने उनको लक्ष्य दिया है 

दुःख के भाले चले कहीं तो 

हमनें अपना वक्ष दिया है 

जितने उदाहरण माँगे दुनिया ने 

हमनें एक एक समक्ष दिया है 

युग की हर एक कसौटी पर 

कस जाना ही योग रहा है 

शिक्षक होना संयोग रहा है


रात हुई थी कब अपनी 

कब उजाले अपने थे 

जीवन में पीछे सोचा तो 

कितने सपने अपने थे 

दिन से रात,रात से दिन तक 

घुल जाना ही योग रहा है 

शिक्षक होना संयोग रहा है





शुक्रवार, 29 अगस्त 2025

अदम्य जीवन


 चंद अँधियारे डरा रहे हैं मुझको अपनी तानों से ,

मैं विप्लव का अदम्य गीत डरता नहीं सयानों से ,,

सागर होता है कितना गहरा पर लहरे नहीं डूबा करतीं है ,
विनाश के डर से आशा की ज्योति नहीं बुझा करतीं है,,

पहाड़ कितना भी ऊँचा हो पर आसमान नहीं छुआ करते है 
पंक्षी अपने हौशलों से नभ में स्वछंद विचरा करते है,,

वियोग, विध्वंस या विनाश हो अपना या धरती समूल नष्ट हो जाए 
पुनः निर्माण का सूत्र हो तो फिर क्या से क्या न क्या हो जाए 

विवश पलों के आँसू गिनकर नया सूत्र तुम बनाते जाओ ,
दुनिया नहीं समझेगी तुमको पर तुम खुद को समझते जाओ !!!!








रविवार, 24 अगस्त 2025

आँखे दुख से फटी रहती है उम्मीद के धागे सी जाएँगे

 एक साथ मिला तो मर जाएंगे 

सपना देखो जी जाएँगे 

जो एक जगह बैठे रहते हो

जीवन लम्हें पी जाएंगे

आँखे दुख से फटी रहती है

उम्मीद के धागे सी जाएँगे 

अब ये कैसी ज़िद है तुम्हारी 

साथ तुम्हारे ही जाएँगे




न जाने अब क्या निकलेगा मुझसे


 मैं अब तन्हाई का मारा हुआ हूँ 

माँ कहती थी क्या प्यारा हुआ हूँ

पानी जो इश्क़ का गुज़रा है बीच से 

उससे तो बस किनारा हुआ हूँ 

होने को सूरज भी हो सकता था लेकिन 

ब मुश्किल से बस सितारा हुआ हूँ

न जाने अब क्या निकलेगा मुझसे 

ऐसा एक जादुई पिटारा हुआ हूँ




शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

🪷और तुम्हें हम क्या बतलाएँ क्या भारत की गाथा है🫂🇮🇳

जिसने दिया हो ज्ञान की गंगा 

जहाँ पे धरती माता है 

जहाँ भाग्य से कुछ नहीं मिलता 

कर्म किया तो पाता है

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है


एक जन्म की बात नहीं है 

पुनर्जन्म भी आता है 

जिसके कर्म श्रेष्ठ रहे हो 

वही यहाँ पर आता है 

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है 


राणा के भाले से लिपटा 

स्वाभिमान का परचम है 

तुलसी का रामायण जैसे 

मुँह में घुलता चमचम है 

ऐसी अनेक कहानी जिसमें 

सहज अपनापन आता है

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है 


वीर शिवाजी की गाथायें 

जहाँ लहू में रची बसी हो 

जहाँ पदमिनी अंगारों पर 

खिलती जैसे एक कली हो 

ऐसी पावन भूमी पर 

व्यर्थ नहीं कोई आता है

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है 


जहाँ पे बिटिया ख़ानदान की 

लक्ष्मी समझ पली बड़ी हो 

जहाँ पे माता पुत्रों के संग 

विपदाओं में साथ खड़ी हो 

ऐसे ही नहीं यहाँ भी जीवन 

दुख में भी मुश्काता है 

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है 


जिसने दिया हो ज्ञान की गंगा 

जहाँ पे धरती माता है 

जहाँ भाग्य से कुछ नहीं मिलता 

कर्म किया तो पाता है

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है


एक जन्म की बात नहीं है 

पुनर्जन्म भी आता है 

जिसके कर्म श्रेष्ठ रहे हो 

वही यहाँ पर आता है 

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है 


राणा के भाले से लिपटा 

स्वाभिमान का परचम है 

तुलसी का रामायण जैसे 

मुँह में घुलता चमचम है 

ऐसी अनेक कहानी जिसमें 

सहज अपनापन आता है

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है 


वीर शिवाजी की गाथायें 

जहाँ लहू में रची बसी हो 

जहाँ पदमिनी अंगारों पर 

खिलती जैसे एक कली हो 

ऐसी पावन भूमी पर 

व्यर्थ नहीं कोई आता है

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है 


जहाँ पे बिटिया ख़ानदान की 

लक्ष्मी समझ पली बड़ी हो 

जहाँ पे माता पुत्रों के संग 

विपदाओं में साथ खड़ी हो 

ऐसे ही नहीं यहाँ भी जीवन 

दुख में भी मुश्काता है 

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है 


जहाँ पिता आदर्श पुत्र का 

सरल साँवला भँवर चित्र का 

आँखों में आँसू भर भर के 

कुल के गीत सहज गाता है

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

क्या भारत की गाथा है

और तुम्हें हम क्या बतलाएँ 

यही भारत की गाथा है…!!!


 🇮🇳 जय हिन्द जय भारत 🇮🇳 

✍️प्रणीत मिश्र🙏






बुधवार, 30 जुलाई 2025

है अमित सामर्थ्य मुझ में





है अमित सामर्थ्य मुझमें, याचना मैं क्यों करूँगा

रूद्र हूँ विष छोड़ मधु की कामना मैं क्यों करूँगा


इन्द्र को निज अस्थि पन्जर जबकि मैंने दे दिया था

घोर विष का पात्र उस दिन एक क्षण में ले लिया था

दे चुका जब प्राण कितनी बार जग का त्राण करने

फिर भला विध्वंस की कटु कल्पना मैं क्यों करूँगा


फूँक दी निज देह भी जब, विश्व का कल्याण करने

झौंक डाला आज भी सर्वस्व युग निर्माण करने

जगमगा दी झोंपड़ी के दीप से अट्टालिकाएँ

फिर वही दीपक, तिमिर की साधना मैं क्यों करूँगा


विश्व के पीड़ित मनुज को जब खुला है द्वार मेरा

दूध साँपों को पिलाता स्नेहमय आगार मेरा

जीत कर भी शत्रु को जब मैं दया का दान देता

देश में ही द्वेष की फिर भावना मैं क्यों भरूँगा


मार दी ठोकर विभव को बन गया क्षण में भिखारी

किन्तु फिर भी जल रही क्यों द्वेष से आँखें तुम्हारी

आज मानव के हृदय पर राज्य जब मैं कर रहा हूँ

फिर क्षणिक साम्राज्य की भी कामना मैं क्यों करूँगा


है अमित सामर्थ्य मुझमें, याचना मैं क्यों करूँगा

रूद्र हूँ विष छोड़ मधु की कामना मैं क्यों करूँगा













 https://sites.google.com/view/arisudan/dhaiAakhar/DA04-Amit-Samarthya#h.cffgjlbulsa3

शुक्रवार, 9 मई 2025

आज तक उस की मोहब्बत का नशा तारी है

 

सर्वप्रथम मै अपनी बातें प्रारंभ करूँ उससे पहले यहाँ पर उपस्थित आप सभी महानुभावों को केरियर पॉइंट यूनिवर्सिटी की तरफ से नमन करता हूँ प्रणाम करता हूँ और स्वागत करता हूँ

और विशेष रूप से यहाँ पर उपस्थित हमारे मुख्य अतिथि .... जो की आये हुए सभी कवियों का मार्गदर्शन और अंकन करेंगें मैं उनका स्वागत और तहेदिल से शुक्रिया अता करता कि वो अपनी सफल उपस्थिति  दर्ज किए हैं ,

आप सब के सहज और प्रशन्न चेहरों को देखकर ये अनुमान लगाया जा सकता है कि आज भी काव्य की उपयोगिता उसी प्रकार हैं जैसे बीते हुए वर्षों में रही है ,

आप सब ने एक सुभाषितानि सुनी होगी

 "काव्य शास्त्र विनोदेन, कालो गच्छति धीमताम्।

काव्य या कहें साहित्य हमेशा से बुद्धिमत्ता का प्रतीक रहा है

तो आइए हम सब अपने मन को आज काव्य से मनोरंजित करते हैं औऱ इस महफ़िल को याद ग़ार बनाते हैं

1:-  नजारे नज़र के भरम भूल बैठे

किनारें समुंदर के ख़म भूल बैठे

आप सबने दिखाया है प्यार इस कदर

हम इस जमाने के ग़म भूल बैठे

2:- माहौल खुशगवार फिर एक बार हो गया

गुलशन तुम्हारे आते ही गुलजार हो गया।

इससे हसीन दिन भी कोई होगा और क्या

 मुद्दत के बाद यार का दीदार हो गया

3:- वो दिन गए कि मोहब्बत थी जान की बाज़ी

किसी से अब कोई बिछड़े तो मर नहीं जाता

वसीम बरेलवी

 

4:- अंधेरा मांगने आया था रौशनी की भीक

हम अपना घर न जलाते तो और क्या करते

नज़ीर बनारसी

 5:- खुदा की नेहमतों को जैसे गिनाया नहीं जाता

 मोहब्बत कैसे हो जाती है? समझाया नहीं जाता

 तुम्हारी देखकर सूरत किसी का दिन निकलता है

नहीं मिलते हो तुम तो रात का साया नहीं जाता

दिखाए किस तरह हम आपको दिल में फंसा कांटा

कुछ ऐसे दर्द हैं साथी जिन्हें बांटा नहीं जाता .

6:-किस कदर शामे मेरी तूने चूड़ियों से बांट दी

किस कदर ये  रोशनी तूने डेवढ़ीयों पे बांट दी

किस कदर मखमलों का काम तूने सस्ता किया है

किस कदर ये ख्वाब देकर जहन को जिंदा किया है

7:-आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा

कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा

पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला

मैं मोम हूँ उसने मुझे छू कर नहीं देखा

8:-जिम्मेदारीयां और भी होतीं हैं सूरज की

सिर्फ उजाला तो बर्क भी फैला देता है

 

 

 

 

 

जैसे पर्वत के शिखरों पर फ़ैली

सूरज की जयमाल रहे

जैसे सरिता में बहती

हर जीवन की रसधार रहे

जैसे फूलों के उपवन में खिलता

प्यारा सा एक गुलाब रहे

वैसे ही मन-जीवन में सबके

आपके प्रति सम्मान रहे

9:-मच्छरदानी तो बाद में इजात हुई

पहले तो मैं माँ का आँचल ओढ़ा करता था

माँ को फिकर इतनी हमारी होती थी

कि, घर से बाहर निकलकर भी निवाला होता था

बिन चप्पल के बाहर चला जाऊं तो

माँ के पैरों में भी छाला होता था

दूर उसके आँचल से बैठकर सोचता हूँ

वो शाया तो कितना अच्छा होता था

10:-हर दुआ कुबूल हो जरूरी तो नहीं

हर शाम की सहर हो जरूरी तो नहीं

मेरे दिल में जो था कल वो यादों का गुबार

आज वो तूफ़ां में शुमार हो जरूरी तो नहीं

 

 

11:-रोना-धोना सिर्फ़ दिखावा होता है

कौन मिरे जाने से तन्हा होता है

उसकी टीस नहीं जाती है सारी उमर

पहला धोका पहला धोका होता है

12:-इश्क़ गुनाह है या इबादत ये इशारा समझूँ

तू आँख खोलें तो कितना है ख़ासारा समझूँ

यही शर्त है वस्ल की तो चल मंजूर है मुझे

मैं भी कौन सा इस जहाँ में उम्र भर के लिए आया हूँ

13:-रात भी नींद भी कहानी भी

हाए क्या चीज़ है जवानी भी

14:-तबस्सुम है वो होंटों पर जो दिल का काम कर जाए 

उन्हें इस की नहीं परवा कोई मरता है मर जाए 

क़दम इंसाँ का राह-ए-दहर में थर्रा ही जाता है 

चले कितना ही कोई बच के ठोकर खा ही जाता है

15:-फड़फड़ाकर पत्तियों सी आम नहीं होतीं

जड़ें किसी मौसम की ग़ुलाम नहीं होती

16:-उसने कब चांद तारे मांगे मुझसे ,मै तो जो हथेली पे रख देता वो बादल ही बहोत था

मुझे नहला कर मां ने कभी गमछा नहीं ढूँढा , मुझे सुखाने को उसका आंचल बहोत था          

17:-मोहब्बत में जवानी पानी करते हैं

जो लोग  बड़े होकर नादानी करते हैं

देकर नए पौधों की जड़ों में पानी

कुछ लोग ही तो इस दुनिया पे मेहरबानी करते हैं

18:-इन नन्हीं -नन्ही कलियों को

ना तोड़ो अपनी डालों से

कल को यही खिलकर पूरे

गुलशन-गुलशन हो जायेंगे

19:- बिछड़ के तुझ से कुछ जाना अगर तो इस क़दर जाना

वो मिट्टी हूं जिसे दरिया किनारे छोड़ देता है

मोहब्बत में ज़रा सी बेवफ़ाई तो ज़रूरी है

वही अच्छा भी लगता है जो वादे तोड़ देता है

20:-तुम क्या जानो अपने आप से कितना मैं शर्मिंदा हूँ 

छूट गया है साथ तुम्हारा और अभी तक ज़िंदा हूँ 

- साग़र आज़मी

21:-बेचैन इस क़दर था कि सोया न रात भर 

पलकों से लिख रहा था तिरा नाम चाँद पर 

22:-बढ़ते चले गए जो वो मंज़िल को पा गए

मैं पत्थरों से पाँव बचाने में रह गया

23:-सबr कर लेना लम्हे ज़ाया मत करना

ग़लत जगह पर जज़्बे ज़ाया मत करना

इश्क़ तो नीयत की सच्चाई देखता है

दिल न झुके तो सज़दे ज़ाया मत करना

जुल्फ़े पलट पलट के इशारा न करो

थोड़ी बहुत तो आशिकी हम भी जानते हैं ,

 

 

 

 

24:-गमों  की  धूप  है, आहों  का  मौसम  सर्द    रक्खा है,

नज़र   में   मैंने आँसू,   दिल में उसका   दर्द रक्खा है,

जिसे दी जिंदगी,मुझको वो तिल-तिल मारता क्यों है?

वो   क़ातिल  है  मेरा, मैंने  जिसे   हमदर्द   रक्खा है..!!

25:-इश्क़ में जुदाई तो होनी ही थी

एक न एक दिन तो विदाई होनी ही थी

मैं कब तक रखता तुझे धड़कनों में छुपा के

एक न एक दिन तो दुनिया से रिहाई होनी ही थी

26:-विद्वत्त्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन ।

स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ॥

27:-इतने क्रूर वीभत्स लम्हों का खेल नही देखा जाता

अब मुझसे इन हैवानों का मनमैल नही देखा जाता

इतनी गहरी करुणा ही क्या जिसमें मानवता ही डूब मरे

मौन की धुन पर सारा जमाना साथ समय के झूल पड़े

28:-तलब की राह में पाने से पहले खोना पड़ता है ,

बड़े सौदे नजर में हों तो छोटा होना पड़ता है ,,

जुबां देती है जो आँशु तुम्हारी बेज़ुबानी को

उसी आँशु को फिर आँख से बाहर होना पड़ता है ,

29:- मिरे दिल की राख कुरेद मत इसे मुस्कुरा के हवा न दे 

ये चराग़ फिर भी चराग़ है कहीं तेरा हाथ जला न दे 

-बशीर बद्र

नजाकत ले के आँखों में, वो उनका देखना तौबा

या खुदा ! हम उन्हें देखें, की उनका देखना देखें ।

-अज्ञात

30:- ये दुनिया नही तुम्हारी है ,

ये देश नही तुम्हारा है ,,

ऐ साँसों में गन्ध फैलाने वालों ,

तुम्हारे बाद भी कोई आने वाला है ,,

वर्षों का इतिहास यही है

समझोगे तो बात यही है

हर आने वाले कल के पीछे

आज का बीता ख़्वाब सही है

31:- आज तक उस की मोहब्बत का नशा तारी है

फूल बाक़ी नहीं ख़ुश्बू का सफ़र जारी है

ये समझ के माना है सच तुम्हारी बातों को

इतने ख़ूब-सूरत लब झूट कैसे बोलेंगे

शुक्रवार, 2 मई 2025

 अगर नहीं मगर लिखूँगा 

इश्क़ को बस नज़र लिखूँगा 

तुम अगर नहीं मिले तो 

तुम्हारे नाम का घर लिखूँगा 

सोमवार, 28 अप्रैल 2025

मेहनत

 आँधी आए  मेहनत करना  तूफ़ान आए  मेहनत  करना 

 बुख़ार आए  मेहनत करना रिश्तेदार आए मेहनत करना   

प्यार आए  मेहनत करना इंतजार आए मेहनत करना 

 क्योंकि  तुम्हारा सच्चा साथी  मेहनत है  जैसे वन में हाथी मेहनत है 

तुम्हारा सफ़र मेहनत  है तुम्हारी  मंजिल मेहनत  है 

तुम्हारी  साँस मेहनत है  तुम्हारी आस मेहनत है

तुम्हारी संगत मेहनत है तुम्हारी रंगत मेहनत है 

लड़ने वालों के कदमों में जहां होता है

 मुश्किलों से भाग जाना आसान होता है

हर पहलू में जिंदगी का इम्तिहान होता है 

डरने वालों को मिलता नहीं कुछ भी 

लड़ने वालों के कदमों में जहां होता है


ये राहें ले ही जाएंगी मंजिल तक हौसला रखो 

कभी सुना है कि अंधेरों ने सवेरा होने नहीं दिया


हौसले की तरकश में कोशिशों का वो तीर जिंदा रखो 

हार जाओ चाहे जिंदगी में सब कुछ लेकिन फिर से जीतने की उम्मीद जिंदा रखो



जलते  दिए से रोशनाई आयी 
बदला मौसम तो अँगड़ाई आयी 
मेरे माथे पे ये विजय की लकीरें 
कई जंग लड़ने के बाद आयी 

राह पकड़ा हूँ कठिनाइयों की 
जरूर जिंदगी आसान होगी 

भंवर से कैसे बच पाया किसी पतवार से पूछो 
हमारा हौसला पूछों,तो फिर मझधार से पूछो 

बुझते चराग़ों को रोशनी बाँटी 
मुरझाए फूलों को ज़िन्दगी बाँटी 
आसमा कम पड़ रहा था चाँद को 
तो हमनें अपनें दिल के ये जमीं बाँटी 
उसनें माँगा था सिर्फ़ कंधा मुझसें 
दरिया से आँखों की नमी बाँटी 

रौनक़ें दीवार की तभी देखेगी दुनिया ,
जब हम नीव के पत्थर जमी में धँसे रहेंगे। 

किसी भी बड़ी और अच्छी इमारत की कल्पना बिना अच्छी नींव के संभव नहीं है उसी प्रकार आईआईटी और NEET के एग्ज़ाम में सफलता बिना foundation के संभव नहीं है 

आपने जो दिखाया है वही प्यार व्यक्त करते हैं 
हम आपके यहाँ आने का आभार व्यक्त करते हैं…..

यार पुराने यार बदल गए



 बस्तों का वो मैलापन 

जेबों के आकार बदल गए 

बच्चों की वो मारा पीटाई 

शिक्षक के अधिकार बदल गए 

 हवा की सोंधी सी खुशबु 

फूलों के वो बाग बदल गए 

उगता है सूरज पूरब लेकिन 

तारों के  कुछ माप बदल गए 

ज़माने की तो बात करें क्या 

देखो पूरे आप बदल गए 

सब्ज़ी में धनिए की ख़ुशबू 

थाली के आकार बदल गए  

सुनने में तो बुरा लगेगा 

पर आपस के सब प्यार बदल गए 

 जीवन का तो ठीक है लेकिन 

यार पुराने यार बदल गए 




हम ना जाने कितने बार उजड़ गए

 सूनेपन के साथ चला तो खामोशी ने मुँह बिचकाया 

अधरों की जो बात कही तो नयनों ने फिर मुँह बिचकाया 

ऐसी वैसी हर आंधी में जाने कितने पेड़ उखड़ गए 

तुम्हें पाने की चाहत में हम ना जाने कितने बार उजड़ गए 


दरिया ने जो लहरें भेजी हमने उनको भी इनकारा 

सागर बन बदल बरसा तो हमने उसको भी इनकारा 

इतने सारे तारे जब जिने पर मिलने आए तो 

हमने उनके हाथ पकड़कर चाँद की तरफ़ किया इशारा