शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022

सब समझते हैं जिसे मैं वो कहानी हो रहा हूँ !!!!!!

 सब समझते हैं जिसे मैं वो कहानी हो रहा हूँ | 

भाव में भीगा हुआ आँखों का पानी हो रहा हूँ | 


दिल का एक शहर था जिसमें हम दोनों ही रहते थे |

साथ में अपने ख्वाब के बादल पीछे-पीछे चलते थे |


तुम जो आंचल लेकर आए दुख भरी इस नगरी में |

हम तो समझे बरसात हुई है प्यास भरी इस गगरी में |


दिल का निरव तरुवर फिर से कुसुमों की भाषा बोल रहा है |

साथ तुम्हारे बीते उस हर पल को अपना बोल रहा है |


सब समझती होगी तुम जो बात यहां मैं बोल रहा हूँ |  

भाव में भीगा हुआ आँखों का पानी हो रहा हूँ | 


उर्मिला की विरह वेदना दिनकर का मैं कर्ण बना हूँ |

तुम्हारी याद में शाख से टूटा एक अदना सा पर्ण बना हूँ |


इस समय की प्यास का मैं और मानी हो रहा हूँ | 

भाव में भीगा हुआ आँखों का पानी हो रहा हूँ | 


जख्म हमारे सिले नहीं और नमक का व्यापार बड़ा है 

दर्द का चेहरा ओढ़े देखो सामने से संसार खड़ा है 


इन नीरव रुदन भरी आँखों में आंसू का कोई शोर लिखे क्या 

ऐसे डरे बुझे दीपक में ज्योति का कोई भोर लिखे क्या 


सब समझते हैं जिसे मैं वो कहानी हो रहा हूँ | 

भाव में भीगा हुआ आँखों का पानी हो रहा हूँ | 

बुधवार, 9 नवंबर 2022

9 Nov speech

 


देश के वर्तमान में इतिहास की गौरवमयी मुस्कान घोलने वाली वीरों की भाषा बोलने वाली राजस्थान की भूमि को मैं प्रणाम करता हूं| और यहां पर उपस्थित निर्णायक महानुभावों , विदुषी नारी शक्ति तथा मेरी आत्मा के दर्पण पर बनने वाली आप सभी की मनोहर छवि को मैं प्रणाम करता हूं|  

और मैं अपनी बात को एक पंक्ति से शुरू करता हूं कि… 

बीते हुए दिनों के घाव देखने से अच्छा है हम भविष्य के रास्ते से कांटे हटाए !!!! 

हम सभी जानते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जिसका सबसे बड़ा गुण यह है कि, वह भविष्य और समय की मांग को नजरअंदाज नहीं करता बल्कि भविष्य के नएपन के लिए तथा समय के  पैनेपन के लिए खुद को तैयार करता है|  जैसे प्रकृति अपने उद्विकास के रथ पर नए जीव तथा उनकी उन्नतशील प्रजातियों को लेकर आती है| 

 वैसे ही मनुष्य अपने जीवन में नए यंत्र और तंत्र खोज निकालता है जिससे उसके जीवन में सुख और सहजता की मिठास फ़ैल सके मल्टीमीडिया उसी एक सहजता का नाम है जिसमें हम लगभग मीडिया के सभी आयामों को मिलाकर  अपने विषय को और अधिक रोचक दीर्घ प्रभावी और सहज अधिगम के योग्य बनाते हैं|

 वर्तमान समय भारत की नींव में पड़ी विचारधारा "वसुधैव कुटुंबकम" को अपना लेने की ओर इशारा करती है जिसे पूरा करने के लिए हमें एक ऐसे साधन की आवश्यकता है जिससे हम क्षेत्र देश विदेश की दूरी को कम कर सके और हम उनके विचारों से जुड़ सकें उनकी बातों को समझ सके और अपनी बात उन तक पहुंचा सके|

 अतः इन सभी बातों की कसौटी पर जो सबसे अधिक उत्कृष्ट और प्रभावी साबित होता है उसका नाम है मल्टीमीडिया जो व्यवसाय, शिक्षा, मनोरंजन, घर, सार्वजनिक स्थान की उन्नति के लिए अपने इमेजेस, ऑडियोज, वीडियोस, ग्रैफिक्स, टेक्स्ट, एनीमेशन जैसे सभी अंगों द्वारा कार्यरत है|

मैं विद्या के पावन मंदिर में खड़ा हूं तो मेरी बात का झुकाव शिक्षा की ओर होना लाजमी है, आज शिक्षा किसी व्यक्ति वर्ग विशेष की नहीं, बल्कि समाज के आखिरी व्यक्ति की चाहत और जरूरत है | अतः शिक्षा के अंत्योदय के लिए जिन कारकों का उपयोग सबसे अधिक प्रभावी रूप से किया जा रहा है, उसका प्रमुख नाम मल्टीमीडिया है|  जब कोई एक अच्छा शिक्षक अपने ज्ञान को टेक्स्ट वॉइस एनिमेशन के माध्यम से विद्यार्थी तक पहुंचाता है तो उस शिक्षा का प्रभाव चिरंजीवी रहता है और इस ज्ञान से पूर्ण बच्चा देश को एक नई दिशा देने का सामर्थ्य रखता है| 



ठाट बाट के धौंस तुम्हारे होंगे तुम ही जानो यहां भूख से खुलती आंखें और भूख पे बंद होती मानो


तारीफों में सिर्फ यही नहीं मुसलसल कि तुम उसकी आंखों की बात करो 

मैंने उसे देखा है जाते हुए तुम उसके आने की बात करो


मन के आंगन में कुंठाओं का राग न उपजे तो अच्छा है 

आंशु से धुले इन चेहरों पर कोई दाग न उपजे तो अच्छा है 

कोमल कुंचित पंखुड़ियों पर आज आया है पहला मधुकर 

स्वाद मोहब्बत का लेकर उड़ जाए तो अच्छा है


मन के आंगन में कुंठाओं का राग न उपजे तो अच्छा है आंशु से धुले इन चेहरों पर कोई दाग न उपजे तो अच्छा है कोमल कुंचित पंखुड़ियों पर आज आया है पहला मधुकर स्वाद मोहब्बत का लेकर उड़ जाए तो अच्छा है

बहुत देर से सोच रहा हूं तेरी तस्वीर देख कर यह मुस्कान तेरे चेहरे से पिघल क्यों नहीं जाती मैं तो चलो परदेस में हूं तन्हा हूं मजबूर हूं तुम मेरे जहन से निकलकर कर क्यों नहीं जाती

सोमवार, 7 नवंबर 2022

उलझ गई दर्द की कहानी खुद मुझसे

 महज कहानी के तौर पर न लेना मुझको 

मैं इस टूटी हुई दास्ताँ से  बहुत ज्यादा हूँ।

तुम मोहब्बत की दुनिया में अभी बच्चे हो 

और मैं तुम जैसे बच्चों का दादा हूँ।


सच है ओछा किसी ने सोचा 

सच में बड़ी बीमारी है 

झूठ की धुनियों में है दुनिया 

झूठ की बड़ी तैयारी है 

सच बोलो तो बड़ी यातना 

दुख से नीरव कोई रात ना 

सच की होती कोई बात ना 

सच की यही बीमारी है 

सच है ओछा किसी ने सोचा 

सच में बड़ी बीमारी है



जमीं अपने जख्मों का सम्मान चाहती है। 

हर बार अपने खेतों में नए मेहमान चाहती है। 

कोई पत्थर से ना ढक दें उसके कोमल चेहरे को , 

इसलिए वो अपना हर बेटा किसान चाहती है।



सामने से समुंदर या विपदाओं का पहाड़ बोलता है। 

इंशान सीना ताने श्रीमान बोलता है, 

कोई भी हो परिस्थिति ताकत का अनुमान बोलता है। 

मगर जब सामने हो भूूख तो सिर्फ किसान बोलता है।


मियां कमाल है पहली मोहब्बत 

पहले पहल मुझे पता नहीं था 

जबतक जफा की राह का पत्थर 

मेरे सर से लगा नहीं था।


चांदनी की ओट में जब रात पैैरहन बदल रही थी 

उसकी स्याह बदन की खुशबू ख्वाब सारे बदल रही थी। 

मैं तो किनारे खड़ा छत के नजर में तेरी आस लेकर समुन्दरों सी प्यास लेकर



कर रहे हो किनारा तो जताना नहीं 

मैं कैसे हुआ था तुम्हारा ये बताना नहीं 


कोई बड़ी आंख वाला मासूम दिखे तो 

रहम करना उसको पटाना नहीं 


अबकी प्यार हो तो बस प्यार करना 

यूँ  हर बात पर जताना नहीं



काशिद पयामे  इश्क पर यूँ  ना उम्मीद मत हो 

ये बदन सलामत रहा तो इश्क और भी होंगे | 


मैं अपने इश्क का बहुत चर्चा नहीं करूँगा। 

जमा पूँजी रखूँगा, खर्चा नहीं करूँगा।।


 एक दीद के खातिर हम तेरे इंतजार में खड़े हैं

तू अपनी खिड़की से बाहर देख हम तेरे प्यार में खड़े हैं|


बस एक जुर्रत की कहानी नहीं है , 

वरना तो क्या मेरे पास जवानी नहीं है!!




दिल बहलाने का सामान मत बन।

तुम मेरे घर मेहमान मत बन।


मैं अपनी मेहनत की झोपड़ी में रहता हूँ

तू मेरी किस्मत की मीनार मत बन!


हाँ बन रही है कहानी अपनी 

मगर तू उसमें किरदार मत बन।


मैं क्या कह रहा हूँ तुझे समझ नहीं आता?

तू मेरे दिल में हिस्सेदार मत बन!


ये जवानी एक दिखावा है 

तू बुढ़ापे का इंतजार मत बन!

तू इस दिखावे का सामान मत बन!




कोई कुछ भी कह ले, मगर आस नहीं जाती। 

बिना पानी के कभी प्यास नहीं जाती।


हां जाती हैं तुम्हारे जाने के बाद कई बसें 

मगर उनको देखकर मेरी जान नहीं जाती।


बहुत जोर से चिल्लाओगे तो गला फटेगा 

वो जहाँ है वहाँ आवाज नहीं जाती।



घर की चीजों में दिखा दी गई खिलौने की खुशी 

हम गरीब घर के बच्चे बाहर की खुशी नहीं जानते।




ज़हन लड़ रहा है जमाने से इंतगाम की सूरत, 

दिल बैठा है सीने में जैसे कोई बात नहीं है। 


तुम्हें हारकर दिल का रोशन हुआ कोना,

तुम्हें जीतकर जीनत-ए-अमान नहीं है। 


आओ की, इंतजार की बीती कई रातें ,  

आओ की इस दिल का कोई हकदार नहीं है। 


आईने में देख रहा हुँ रक्स आँखों का ,

दिल डूब रहा है आँसू में कोई बात नहीं है।



वक्त ने उसे और खूबसूरत कर दिया।

अब उसकी मुस्कान दोनों गालों पर और ऊँचे  माँसल टीले बनाती है 

जिसकी नरमी ऐसी है जैसे बारिश के तेज बहाव में इकट्ठा हुई मिट्टी की तहें 

जिसकी छुअन बहुत कोमल होती है और आदमी एक बार फिसल जाए तो उन तहों में धंसता चला जाता है।



बादलों की चादर ओढ़े आसमा जब हवाओं के साथ कदमताल करता 

सूरज की लाल सुर्ख गलियों में अपने माधुर्य का नीलत्व घोलता है तो 

लगता है मानो! नए प्रेम में आई प्रेमिका अपने पहले चुंबन के एहसास को याद कर रही हो?

उसके बदन में रोमांच की कपकपी सर से लेकर पैर तक दौड़ जाती है।

उसके बदन के मांसल टीले थोड़े सख्त हो जाते हैं जिसका आभास कपड़ों से बाहर आ रहा होता है। 

वह बार-बार अपनी निगाहें नीचे करके अपने आप को एक पर्दे में समा देना चाहती है 

क्योंकि वह नहीं चाहती की कोई गैर उसकी स्पंदन की रौनक को महसूस करें।


 जख्म जब दिल से उतरा तो माज़ी हो गया। 

मेरे बदन का हर एक हिस्सा कामकाज़ी हो गया। 


उसने इस कदर लहजे में की बात मुझसे 

मेरे रूह का हर एक हिस्सा राज़ी हो गया।



सिलसिले ख्वाब के बेकार हो गए। 

हम तुमसे बिछड़ कर शहरयार हो गए।


कभी तसल्ली से बैठते थे अपने घर के आँगन में 

अब तो घर में भी जैसे बाजार हो गए।


सबसे अजीज रिश्ता भी इस शक्ल में टूटा 

हम अपने ही भाई के कर्जदार हो गए।


करते थे जिससे बात हम पहरों पहर पहले 

अब उसकी खनक के लिए बेकरार हो गए।


ना जाने वक्त ने क्या खेल कर दिया

हम अपने ही घर में हिस्सेदार हो गए।



किसी दिन गुबार बनके उठेगा मेरी आंखों का लहू 

अभी रगों में दौड़ रहा है शराफत के लिए।


शिक्षक दिवस 

सहज हरदीप की अपनी रवानी हो न पाती 

तुम्हारे बिन जीवन की कहानी हो न पाती।

महज सब किस्मत की रेखा से उलझते 

तुम्हारे बिन कोई और निशानी होना पाती!



जरूरत तो बेशुमार होने की है। बीमार तो बहुत दिन से हैं इश्क में।


तुमसे तो वादे तक टूट गए अपने। हमसे तो हौसला भी नहीं टूटा अपना!



खुद का हाथ भी कभी हाथ पर नहीं रखता। 

मैं शायरी में झूठे जज्बात नहीं रखता।


 तुम हो मासूम ये बात मालूम है मुझे । 

इसलिए ही तो तुम्हारे कंधे पर कभी हाथ नहीं रखता।।


 ये दुनिया है इसकी धार से थोड़ा अलग बैठों । 

इस मझधार में कोई इंतजार नहीं रखता।।


दीवार पर बने शाए तो बुरा लगता है। 

इसलिए ही तो मैं घर में कोई चिराग नहीं रखता।।


कई बार देखूं तो कुछ असर होता है। 

मैं चेहरे पे एक बार में नहीं मरता।।  एतबार नही रखता


तुम्हारे बदन की बनावट ही कुछ ऐसी है। 

तुम्हें देख लूँ तो कोई और नहीं जंंचता।।


अंधेरे कमरे में रोशनदान जैसे   

आप लगतें हैं मेरे मेहमान जैसे. 

मैं इस कुनबे को जब भी देखता हूँ  

सब नज़र आते हैं मेरे खानदान जैसे।


बड़ी मुश्किल से मोहब्बत में ये मुकाम आता है। 

तुम किसी और को भी देखो तो वह याद आता है।


मोहब्बत सख्त राहों में नहीं टिकती मेरे मालिक , 

ये एसी बात है जिसका कोई शिकवा नहीं होता। 

समुंदर की तरफ दौड़ती नदियों ने यह कहा , 

मोहब्बत हो अगर दरमियाँ तो कुछ कड़वा नहीं होता।।


वक्त को नामंजूर सही मेरे ख्वाब का तरन्नुम 

पर मैं यही एक गीत बार-बार गुुनगुनाऊंगा।

 कितने वक्त तक पालने पड़ते हैं एक ख्वाब आंखों में? ✍️#prankeparinde


सच कहता हूं, झूठ नहीं है सूनी आंखों में ख्वाब का कोना ।

ये पत्र बता रहे हैं सबसे रात के बाद फिर दिन का होना ।।


ख्वाब को तामीर करते हुए रो दिए , 

हम अपने आप को जागीर करते हुए रो दिए। 


वो इतना दूर चला गया मेरी बाहों से , 

कि हम उसको आवाज लगाते हुए रो दिए। 


एक ही तो हुनर सीखा था हमने मोहब्बत में , 

सो उसकी याद आयी और हम हुए रो दिए। 



सुकून  का एक कतरा भी हमारे नाम नहीं आया | 

तुम्हारी याद का मौसम हमारे कोई काम नहीं आया || 


मैंने घोल कर आंसू कुछ फीके किये मगर ,

ये जज्बात का फीकापन भी कोई काम नहीं आया || 

 

उलझ गई दर्द की कहानी खुद मुझसे ,

मेरा किरदार का सीधापन कोई काम नहीं आया || 


ले जाए जिसे जरूरत हो इस बेतुक की चीज को ,

ये दिल तो मेरे कभी कोई काम नहीं आया ||


तट पर पटक-पटक कर माथा 

सागर खारे हो जाते हैं | 

उड़ कर पंछी पिजरे से अपने 

और भी प्यारे हो जाते हैं ||


सितम जदा है ख्वाब सारे 

मैं उनकी तहे पलट रहा हूं 

मैं अपने जख्मों की नई कहानी 

पुराने जख्मों से कह रहा हूं 

तुम मेरे इरादों से जान लो 

कि मैं यहां पर नहीं रुकूंगा 

तुम कितना चाहो लेकिन 

मैं तुम्हारे आगे नहीं झुकूँगा 

सोमवार, 3 अक्टूबर 2022

आँटे की चिड़िया






 घर से दूर आये आज सालों हो गए 

मैं अपनी कुर्सी पर पीठ टिकाये बचपन की यादों में खोया था  

अचानक एक विचार मन में न जाने क्यों उभर आया 

माँ को बचपन में रोटियां बनाते समय

मैं कई बार गुथे हुए आंटे से खेलने की जिद करता था 

माँ हर बार मेरी जिद को पूरा करने के लिए 

मुझे गुथे आटे से कोई आकार बना कर देती थी  

मैं आज सोचता हूं 

तो उन आकारों में विशेषतः जो मुझे याद आते हैं 

वो या तो अधिकतर चिड़िया बना देती थी या साँप बनाकर देती थी  

और मैं उन बनी हुई आकृतियों को पाकर काफी खुश और  संतुष्ट महसूस करता था 

पर अब बैठकर सोचता हूं तो समझ आता है 

माँ जाने अनजाने में मुझे एक बात सीखा देने की फिराक में थी कि 

बेटा जो ये भूख है ना एक दिन तुझे परिंदों की तरह मुझसे दूर उड़ा ले जाएगी  

और ये भूख रुपी विषैला नाग एक दिन हमको आपको सभी को डस लेगा

और हम सब एक दिन मर जाएंगे लेकिन ये भूख नहीं मरेगी ;;


घर के बर्तन से खुशी निकाल लेते हैं '

गरीब घर के बच्चे खुद को संभाल लेते हैं ; 


हाँ माना की वो चीजों के बहुत पास नहीं होते '

लेकिन गरीब घर के बच्चे कभी निराश नहीं होते ;

 

घर की चीजों में दिखा दी गई खिलौने की खुशी 

हम गरीब घर के बच्चे बाहर की खुशी नहीं जानते।



बुधवार, 9 मार्च 2022

धरती और चाँद

 कल रात चाँद को देख 

धरती खुशी से झूम उठी 

जैसे रस का स्वाद जानकर 

नाच उठती है मधुमक्खी , 

जैसे माँ के पल्लू में छुपकर 

अदृश्य हो जाने की बात करती एक बच्ची , 

कल रात वैसा ही दृश्य बना था। 

आसमा से जब सफेदी बरस रही थी, 

चकोर की आँखों में प्रेम की सिल्ली पिघल रही थी।

पेड़ों की शाखाएं ऐसी झुकी थी जैसे 

दादाजी की कमर जीवन का बोझ उठाते-उठाते झुक गई हो।

मैंने अब चादर हटा दिया था अपने सर के नीचे से 

और अपने कानों को रख दिया था जमीन पर 

और मैंने महसूस किया ..............

धरती अपनेपन का मधुर गीत धीरे-धीरे  मेरे कानों में घोल रही थी, 

जिसकी मिठास और शीतलता 

आत्मा की बेचैनी भरी कड़वाहट को 

ऐसे काट रही थी जैसे चाक पर मिट्टी के बर्तन को धागा।

जिसकी अलगाव से अधूरापन नहीं बल्कि समग्रता का बोध एहसासों की दीवारों से टकराकर कर पूर्ण होने का इशारा दे रहा था। 

धरती आपकी थकान और प्रेम के अनुरूप ही अपनी कोमलता जाहिर करती है। 

आपके भावनाओं के अनुरूप!    ना कि एक सूत ज्यादा ना कि एक सूत कम।



शुक्रवार, 4 मार्च 2022

रसिया और यूक्रेन युद्ध

 आइए थोड़ा समझते हैं रसिया और यूक्रेन के बीच हो रहे युद्ध के बारे में….






युद्ध का ये मोड़ कहीं ना कहीं यूक्रेन का नाटो में मिलन अथवा मिलन की इच्छा का परिणाम दिखाई देता है अतः हमें नाटो के बारे में जानना अहम हो जाता है ,

नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन(North Atlantic Treaty Organization) यह एक इंटरगवर्नमेंटल मिलिट्री एलायंस है जो कि 4 अप्रैल 1949 को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बना इसका मुख्यालय ब्रुसेल्स बेल्जियम में है |  यह संगठन या कहें इस संगठन का कार्य सदस्य देशों के ऊपर बाहरी आक्रमण की स्थिति में राजनीतिक और  सैन्य शक्तियों का सहयोग देना है | इसमें अब तक 30 सदस्य शामिल हो चुके हैं मैसिडोनिया  इसमें  शामिल होने वाला सबसे आखरी देश है द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दो महा शक्तियां बनी पहली सोवियत संघ तथा दूसरी अमेरिका | अतः सोवियत संघ द्वारा यूरोप पर साम्यवाद की स्थापना का प्रयास तथा अन्य ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए NATO संघ का निर्माण किया गया |  अतः हम कह सकते हैं NATO का उद्देश्य स्वतंत्र देश की रक्षा के लिए और युद्धस्थ साम्यवाद को पराजित करने के लिए नाटो का निर्माण किया गया |  अतः जब रसिया का पड़ोसी देश यूक्रेन नाटो का सदस्य बनना चाहता है तो रसिया इसका विरोध कर रहा है |  उसका मानना है कि अमेरिका या कहे नाटो के सदस्य देश की मिलीजुली सैनिक व्यवस्था उसकी  सीमा तक पहुंच जाएगी जिसकी वजह से उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है अतः उसने युक्रेन को NATO  से जुड़ने के लिए मना कर दिया है पर युक्रेन भी अपनी स्वतंत्र होने की पुष्टि तथा संकट की स्थिति में सहयोग पाने की लालसा से  NATO से जुड़ना चाहता है|

      यही कारण है कि यूक्रेन तथा रसिया के बीच में यह युद्ध चल रहा है| 

                  इस पूरे ब्लॉग  को पढ़ने के लिए बहुत-बहुत                                                     शुक्रिया आप हमारे साथ जुड़े रहिए धन्यवाद ….. 

मंगलवार, 1 मार्च 2022

शिवालय

 मुझे तो खिजाँ की कोई फिक्र ही नहीं , 

उसकी एक मुस्कान बहुत है चहु ओर चमन को।


तुम्हारी खुशियां हमें बर्दाश्त है लेकिन 

तुम्हारे गम हमसे देखे नहीं जाते।


युग जुगती के भरोसे छोड़कर कहाँ गए वो मदमस्त दीवाने , 

महज अधूरी रही कहानी जब से चले गए परवाने।


अपनों की नजरों में गिर जाना होता है। 

सच कहने का इतना हर्जाना होता है।


जख्म हो रहा पांव में 

फिर भी मलहम का लेप नहीं है। 

पागल कुत्ते की भनक है फिर भी 

भय का कोई चेत नहीं है। 

इतनी निष्ठुर दुनिया में 

सादे पन की हेठ नहीं है। 

इतना साधु पन ठीक नहीं है।

देश टूट रहा है पल-पल 

विचारों की खाई बढ़ती है। 

जनहित की अगर बात करो तो 

अंगड़ाई पड़ती है। 

स्वार्थपने का अफीम चढ़ाकर 

शख़्स बेहोशी वाला है 

जो देश के खिलाफ बात करे 

वो शख्स! .... वाला है।


उठे हुए सिर को सभी , 

झुके हुए हृदय को कोई नहीं देखता। 

चाँद को देखते हैं सभी 

कोई आसमा को नहीं देखता।


कैसे जीत हासिल करते हम, हर शय पर दाँव हमारा था। 

जीत तुम्हारी हार हमारी , दिल तो बस बेचारा था।


नाहक ही वो टूट गया। वो तो बस दीवाना था। 

चाल चली थी आँख ने मिलकर ,वो तो बस परवाना था।


उसकी आंखें मौन हुई जब, 

हम आँशु की धड़कन सुनते थे। 

सांस की हर एक करवट पर 

पलटकर उसका माथा चूमते थे। 

समाँ बुझा दी जाए अब तो 

ख़ालिक का ये फरमान हुआ है। 

मुझे बनाने वाला देखो, 

आज मेरे घर मेहमान हुआ है। 

वो तेरे हाथों का हर स्पंदन , 

धीरज दिल का चुन लेता था। 

पर मेरा मन ना जाने क्यूँ 

आशा के धागे बुन लेता था। 

उन फ़कत कांपते होठों पर 

बस सारी विवश पहेली थी ।

वैसे तो आंखें दो होती हैं 

पर उस वक्त अकेली थी ।


होठों के वरक पर लिखीं हों सारी खुशियाँ ,  

न कमी की कोई शिनाख्त हो कहीं से ।। 

रहे सलामत ये जोड़ी तुम्हारी  , 

न हो गमों की तिजारत कहीं से।।



दे दे नए कृपाँण मुझे 

जीवन के दुर्दस बाण मुझे 

ये नई कहानी होने दे 

मुझको अपना कुछ खोने दे

मैं रसिक नही की रसपान करूँ

जीवन का लोभ में दान करूँ

मुझे अड़िग हिमालय बनने दे

सच का एक शिवालय होने दे

मैं करूणा की थाल का दीपक हूँ

सच के माथे का पीतक हूँ ।




















शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2022

गाँधी जी के रचनात्मक कार्य पे भाषण

 हम सभी जानते हैं कि हर एक जीवंत चीज अपने आप में रचनात्मक होती है क्योंकि जीवन का एक मूलभूत लक्षण ही रचनात्मकता है और गांधीजी ने जीवन के हर एक पहलू और जीवन के हर एक रुप का सम्मान करते थे। इसलिए ही तो उन्होंने अपने जीवन का मूलभूत सार ही अहिंसा रखा क्योंकि अहिंसा ही एक ऐसे कसौटी है जिस पर चलकर सही मायने में रचनात्मकता का सम्मान हो सकता है। क्योंकि जिस चीज का सम्मान आप सम्मान नहीं कर सकते, उसका निर्माण क्या करेंगे। गांधी जी ने सांप्रदायिक एकता जातीय भेदभाव को दूर करना, शराबबंदी खाद एवं ग्रामीण उद्योग गांव की सफाई नहीं, बुनियादी, तालीम प्रौढ़, शिक्षा स्त्रियों की उन्नति स्वास्थ्य एवं सोच की शिक्षा जैसे कई पहलुओं पर बड़े सुदृढ़ और सफल प्रयास किए जिससे हमारा देश शहर, स्वाभिमान और अपने गौरव के संभल से आजाद देश की रचना कर सका।

हम सभी शिक्षा के मंदिर में उपस्थित हैं तो मैं सभी रचनात्मकता की जननी शिक्षा अर्थात अधिगम अर्थात नहीं। बुनियादी तालीम की बात करना चाहता हूं क्योंकि शिक्षा ही समस्त दोषों का एकमात्र उपचार का साधन है। गांधी जी का शिक्षा से अभिप्राय था की बालक के शारीरिक बौद्धिक और नैतिक विकास के द्वारा बालक की आंतरिक अंतर शक्तियों को विकसित करना है। साक्षरता ही शिक्षा नहीं है और साक्षरता ना तो शिक्षा का आदी है और ना ही उसका अंत यह तो मनुष्य को शिक्षित बनाने के लिए अनेक साधनों में से एक है। अतः शिक्षा का आरंभ साक्षरता से नहीं बल्कि कार्य से करना चाहिए। महात्मा गांधी ने इसी को लक्ष्य बनाकर 23 अक्टूबर 1937 को शिक्षाविदों की एक सभा बुलाई तथा बहुत विचार विमर्श के बाद निम्नलिखित सुझाव दिए गए। 7 से 14 वर्ष के बालक बालिकाओं को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा दी जाए तथा संपूर्ण शिक्षा का संबंध किसी आधारभूत शिल्प या उद्योग पर आधारित आधारित हो। सिर्फ का चुनाव बच्चे की योग्यता तथा उसकी चुचियों पर हो इस प्रकार से चित। एक बच्चे के अंदर एक कौशल का विकास हो जिससे वह आगे के जीवन में स्वावलंबी बन सके। आत्मनिर्भर बन सकें और आजाद बन सके। निर्भीक जीवन जी सके तथा परिस्थितियां कैसी भी हो। अपना आत्मविश्वास ना खोए ।

वियोग विध्वंस या नाश हो अपना या धरती समूल नष्ट हो जाए। 

पुनर्निर्माण का सूत्र हो तो फिर क्या से क्या न क्या हो जाए। 

विवस पलों के आंसू गिन कर नया सूत्र तुम बनाते जाओ। 

दुनिया नहीं समझेगी। पर तुम खुद को समझते जाओ।

  ....... धन्यवाद 





गुरुवार, 17 फ़रवरी 2022

मेरे एकांत की चीख

 मेरे एकांत की चीखों को चुपकराती 

तुम्हारी यादों का संघर्ष, मैंने देखा है। 

मैंने देखा है, तुम्हारी कपोलों का लाल गुलाबी पन 

जिसकी गहराई में 

कितनी इच्छाएं कितनी वासनाएँ फली फूली हैं, 

जिनके स्पर्श से वक्त का बेदाग चेहरा भी 

मलिन हुआ है ।

जैसे किसी गोरी के बाएं गाल की ढलान पर 

काला तिल मलिन होकर भी 

उसकी खूबसूरती का हॉलमार्क बन जाता है। 

मैंने देखा है, पहाड़ों से लुढ़कता हुआ मद मस्त पत्थर। 

जिसको अपने गिरने का मजा आता है ।

मैंने देखा है, अपने हाथों का स्पर्श 

तुम्हारे कोमल बदन पर 

जैसे सफेद धूल की चादर पर 

छीटों के निशान हो। 

मैंने देखा है, तुम्हारी आँखों में मोहब्बत की नाव 

जिसे तुम बार-बार किनारे आने से रोक रही थी। 

मैंने देखा है तुम्हारी साँसो की अनियमित गति  

जिसकी चाल से इश्क़ की लौ 

आज तक जल रही है। 

मैंने देखा है तुझे हर एक शय में 

जिसे दुनिया आज देख रही है।











बुधवार, 16 फ़रवरी 2022

नई रचना

 कभी कोई फकीर तो कभी कोई ख़लीफ़ा होगा , 

मगर वक़्त के बदलने का एक सलीका होगा ,,

जिन कदमों के निशान दिख रहे हैं आते हुए 

शायद ये उनके जाने का सही तरीका होगा ,,



शिकस्त की दवा नहीं , 

बुझा दे जो वो हवा नहीं। 

तू इश्क लाजवाब है।

महज कोई बवा नहीं उठा। 

उठा ले अपनी उंगलियों से , 

ये जो तीरगी की राख है। 

लगे ऐसा देखकर कि 

यहां कोई जला नहीं। 

यहां कोई बुझा नहीं।



नंगी ख्वाहिशें बेताब है बाहर आने को , 

पर वह चाहती हैं तुम्हारे इशारों की ओट ,  

तुम्हारी मंजूरी का लिबास । 

जिसको पहनकर वो खिलखियाएँगी, 

मुस्कुराएंगी झूम उठेंगी 

तुम्हारी आंखों के सामने । 

तुम देखना उन्हें वो कितनी प्यारी है, 

कितनी चंचल है, 

जैसे होते हैं हिरण के बच्चे 

उतने ही चुलबुल उतने ही नाजुक। 


हम जैसे नाकाम दीवाने 

बसंत बहारें क्या जाने 

फूल की खुशबू क्या होती है 

ज़हन की बदबू क्या होती है 

हम तो इस बात पर होते हैं 

देखो आगे क्या खोते हैं, 

खून के आंसू रोते हैं 

रात को तन्हा सोते हैं। 

दर्द में इतने होते हैं 

जैसे हर वक्त के फितने होते हैं 

छोड़ो मेरा मेरा क्या है? 

तुम बताओ हाल तुम्हारा 

चंपा की कहानी कैसी है, 

वो रात की रानी कैसी है 

सबा ने फिर क्या ख्वाहिश कि 

वो जज्बाती कहानी बाईस की 

क्या कहा सब कुछ छूट गया

मोहब्बत में फिर से लुट गया 

चलो फिर आओ जुलूस बने हम 

मोहब्बत के नाम का खुलूस बने हम


किसी से ना कोई बात बताया 

किसी पे ना कोई इल्जाम दिया। 

दर्द ने हमको जब भी पुकारा 

हमने अपनी बाँहों का ईनाम दिया।


खुशियों के स्पंदन से लेकर डर के घोष तक आए ,

हम मोहब्बत के होश से चलकर मदहोश तक आए ,,


इतनी गहरी उतर गई है तीरगी 

अब तो दिल में भी अँधेरा हो रहा है













हम मोहब्बत के नाम का खुलूस बने ।

रविवार, 30 जनवरी 2022

30 jan

 मोहब्बत को आप कह रहा हूँ

यानि मैं पूण्य को पाप कह रहा हूँ

यानि सलीक़े से पाप कह रहा हूँ



इससे सीधा कोई और रास्ता नही हो सकता ,

मेरा अब किसी और से, कोई वास्ता नही हो सकता ,,


जीने दीजिए बेरूखी से हमें ,

यूँ मुश्कुरा के दिल को न आबाद करिए ,, 

हजारों फूल की मासूमियत कुर्बान हुई ,

तब जाके वो लड़की मेरे घर मेहमान हुई ,,


इससे आगे की दुनिया नहीं देखी जाती ,

मुझसे किसी शक़्स की कमियाँ नहीं देखी जाती,, 



मंगलवार, 25 जनवरी 2022

25 jan

 अपराधों की बात नहीं

माया की कोई काट नहीं 

छोड़ विषय को खुद में डूबे 

ऐसा कोई व्यापार नहीं  , 


यहां धड़ों पर सर दिखतें हैं 

जो झूठों के आगे झुकतें हैं 

इनकी आंखों में गौर से देखो 

स्वार्थ भरे कुछ दीप दिखतें हैं। 


ऐसी दुर्दश दुनिया में 

अच्छी सोच को सोचने वाले 

मिलेंगे तुमको फूल तो लेकिन 

नहीं मगर वह खिलने वाले।



सच  कहूँ  तो  खोजो  मत 

आनन्द  कहाँ  से  होता  है

फूल  के  यौवन  का  सुंदर

विस्तार  कहाँ  से  होता  है 


नदियों  का ये  बहता  पानी 

बेताब  किस  लिए  होता है

मृत्यु  सत्य  है  तो  जन्म का

अधिकार किस लिए होता है


सच   है  यही  की  कस्तूरी 

हर  मृग  के  अंदर होता है

पर नाजाने  क्यूँ  दुविधा में 

वो जंगल-जंगल  ढूँढता  है


बाहर की खुशियों के पीछे

अंदर का आनन्द मर जाता है

राम को राम बनने से पहले

घर का दशरथ मर जाता है।



कर्तव्य की गूँगी राहों पर 

कर्म का गूंजता विधान रहे

हर मानव के झुकते कँधे पर

सम्बल का उजला परिधान रहे


ये वीर भूमी ये प्रणय वात

ये सूरज की उजली आभा

सम्मलित हो हर आँखों में

इज्जत की एक ऊँची साफा


बलिदान वही उच्च रहेगा 

जो मिट्टी को दिया गया हो

वही दूध बन अमृत रहेगा

जो वीरों द्वारा पिया गया हो।


मोहब्बत  रेत  को  मोती  बना देती है

भूख  घाँस  को  भी  रोटी  बना  देती है

अगर  जज्बा  न  हो  आजाद  रहने का

तो ये दुनिया हर शख्स को कैदी बना देती है



इतिहास नहीं पुराण लिखेंगे 

फूल नही मुश्कान लिखेंगे

इन दर्द की ऊँची चट्टानों को 

मलहम का वरदान लिखेंगे


सुबह झरोखे से आती

सूरज की मुश्कान लिखेंगे

बेरँग हुई तितली को भी

बस रँगों से अंजान लिखेंगे


सोमवार, 24 जनवरी 2022

24 jan

 छोड़ना ही है जिसे उसे मंजूर मत करो ,

मोहब्बत के नाम पे ये कुसूर मत करो ,,


अब लगी है चोट दिल पे तो रोते क्यूँ हो ,

मैंने तो पहले ही कहा था हुजूर मत करो ,,


आ रही है याद तो उसकी तसवीर मत देखो,

बैठ जाएगा ये ज़ख्म इसे नासूर मत करो ,,


बहुत ज़्यादा दूरी का मैं तरफदार तो नहीं ,

पर बहुत पास आकर भी उसे दूर मत करो,,


चल जाता है काम तो बस कॉल से चला लो ,

यूँ रोज-रोज मिलने के लिए मजबूर मत करो,,


मिला है जिश्म तो फूलों से सलाहियत लो ,

खामखाँ इस लहर पर बहुत गुरूर मत करो ,,


वैसे तो एक मुझसा दीवाना बहुत है शहर में ,

यूँ हर जगह मुश्कुरा के खुद को हूर मत करो,,


#prankeparinde




रविवार, 23 जनवरी 2022

23jan नेता जी जयंती

 गुफ्तगू अँधेरों की भा जाएगी मुझको ,

लगता है ये उदासी खा जाएगी मुझको ,,

तुम्हें दीवारों से राब्ते की कोई खबर नहीं ,

ये नई दिल लगी  ही तो ढा जाएगी मुझको ,,


चिरागों की सिसकियाँ नहीं देखी जाती मुझसे 

मैं सूरज के इंतजाम पे काम कर रहा हूँ ,

जिंदगी में जितने की हैसियत नहीं है मेरी 

उससे ज्यादा के, घर के काम कर रहा हूँ  ,,


तुम्हें आसान लगती है आजादी की कहानी यारों ,

बदन का लहू नहीं है पानी यारों ,,

कितनों ने घर कितनों ने जवानी छोड़ी ,

तब जाके हर एक की किश्मत में ये निशानी छोड़ी,,



शनिवार, 22 जनवरी 2022

दर्द की दुनिया का पंछी हूँ...




 दर्द की दुनिया का पंछी हूँ

हद की मंजिल जाना है। 

मुझे मुसाफिर बना कर देखो 

मेरे अंदर एक परवाना है।। 


ये जख्म के गहरे दाग देख लो

या लाल आंसुओं की कतार ।

मेरे उन्मुक्त जीवन पर बरसी 

ना जाने कितनी अनंत कटार ।।


पर फिर भी ,

मैं सुबहे अरुण सा चमक रहा हूँ 

अंधेरों पर दमक रहा हूँ । 

तुम तो अपनी आँख खोल लो  

सच क्या है, ये बात बोल लो ।। 

रसना का उपयोग यही है

सच कहूं तो भोग यही है ।


आओ उठाकर शमशीरें 

दे दें तिलिस्म की छाती में ।

या करें वार भीषण उसपे  

जो खेल दिखाए रात्रि में ।।


यहाँ कोई भाग्य नहीं है 

कर्मठता से पहले ।

मानवता का मूल नहीं है 

निर्मलता से पहले।।

शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

जवाब

इससे आगे का जवाब नहीं आता, 

मोहब्बत बीच में हो तो हिसाब नहीं आता। 

तुम बुलाते हो तो आ जाते हैं गैर भी कई ,

हम बुलाते हैं तो अहबाब भी नहीं आता।

हमें मंजूर है मोहब्बत में गुलामी क्योंकि,

तुमसे दूर रहकर भी तो इंकलाब नहीं आता!


तुम्हारे न्याय हमें क़ुबूल नहीं हैं ,             

हमें खुद की अदालत खोलनी है ,,            

जो पट्टी आँख पर बाँधी है तुमनें ,          

उसे एक तमाचे से बस खोलनी है ,,


अदम्य साहस की जुबानी , हमी पर अब जवां होने लगी है ,,

दुःखों का दौर अब जा चुका है , कहानी अब दवा होने लगी है,,










रविवार, 16 जनवरी 2022

इनकार नहीं करता .....

 जो अपने होने का एतराज नहीं करता ,

ख़ुदा ऐसे अमीरों पे एतबार नहीं करता ,,


ये कहानी है मेरे दौर के  हर एक शख़्स की  ,

कोई पीछे छूट जाए तो इंतजार नही करता ,,


मैं कलम लेकर माँग रहा हूँ शोहरत अपनी ,

मुझे पता है माँगने से कोई उपकार नहीं करता ,,


बड़ी खुद्दारी से पाला है मुझे मेरे बाप ने,

मेरे पास हो कुछ देने को तो मैं इनकार नही करता ,,

  ....धन्यवाद आप का 🙏

शुक्रवार, 14 जनवरी 2022

मज़बूरी

तुम्हारी मजबूरियाँ समझ रहा हूँ मैं , 

तुम्हें भी दुनिया जैसा होना है ,,

रविवार, 2 जनवरी 2022

पहले-पहल

 पहले पहल नहीं पता था 

इश्क़ इतना भी होता है, 

जब बिछड़े महबूब किसी का 

आंखें भर-भर रोना होता है। 


हम तो पहली बार निकल कर 

घर से तन्हा हो गए जब 

मां को याद किया पल पल में 

हर पल मां को रोए जब ,


तब हमको विश्वास नहीं था, 

ना ही पता था दिलदारी का 

अबकी जब वो दूर हुई तो 

पता चला इस दुनियादारी का ,,